भादो की पहली शाम रस घोलते जलेबा के नाम और गांव गलियों में गूंज उठा ऋतु गान। महिलाओं ने भी ढोलक की थाप पर कजरी की तान छेड़ी और मनोविनोद में पूरी रात काट दी। मौका था लोकमानस से जुड़े पर्व रतजगा का जो द्वितीय लोप होने से भाद्रपद के पहले ही दिन आज सोमवार को मनाया गया।
सूरज ढलने के साथ ही रतजगा की रौनक बिखर आई। ढोलक की थाप पर बनारस और मीरजापुर की कजरी की तान से सड़कें और गलियां आनमान रहीं। नवापुरा, दारानगर, नरहरपुरा, पियरी, चेतगंज, चौकाघाट, ईश्वरगंगी समेत विभिन्न पुराने मोहल्ले में कजरी के सुर रात भर गूंजते रहे। हरहुआ, चौबेपुर, चिरईगांव, आशापुर, सारनाथ समेत विभिन्न इलाके भी गुलजार रहे। शामत उन पुरुषों की भी हुई जो नितांत महिलाओं के लिए सुरक्षित इस मौके पर उनके सामने पड़ गए। ऐसी हंसी ठिठोली कि उन्हें मैदान छोड़ कर भागना पड़ा। कई मोहल्लों के छोटे छोटे मंदिरों में कजली की महफिलें जमीं। हालांकि इनकी संख्या थोड़ी ही रही लेकिन बिसरते पर्व में दम भरती रही। दुकानों पर सजे जलेबे के छत्ते ने युवा पीढ़ी को इस पर्व की याद दिलाई। हलवाइयों ने जलेबे की बिक्री के लिए खास काउंटर बना रखे थे। दोपहर दो बजे के बाद सभी आइटम बंद और जलेबे की तैयारी। शाम के साथ ही ग्राहकों से मानों फुर्सत ही नहीं।
कजली तीज आज : मंगलवार की सुबह रस्म के अनुसार कजली तीज का पर्व मनाया जाएगा। रस्म के मुताबिक बहनें गंगा की मिंट्टी में बोई गई जरई (जौ की कोपलें) का पूजन कर उसे देवालयों में अर्पित करेंगी। प्रसाद रूप में प्राप्त जरई को भाई के कानों पर चढ़ाकर उनके अन्न धन से समृद्ध होने की कामना करेंगी। बनारस में अभिभावकों और बुजुर्ग मुखियाओं को भी जरई भेंट करने की परंपरा है।
@ राजेश शुक्ल





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