शान्तिरंजन गंगोपाध्याय

काशीखंड, स्कंद महापुराण का एक खंड जिसमें काशी का परिचय, माहात्म्य तथा उसके आधिदैविक स्वरूप का विशद वर्णन है। काशी को आनंदवन एंव वाराणसी नाम से भी जाना जाता है। इसकी महिमा का आख्यान स्वयं भगवान विश्वनाथ ने एक बार भगवती पार्वती जी से किया था, जिसे उनके पुत्र कार्तिकेय (स्कंद) ने अपनी माँ की गोद में बैठे-बैठे सुना था। उसी महिमा का वर्णन कार्तिकेय ने कालांतर में अगस्त्य ऋषि से किया और वही कथा स्कंदपुराण के अंतर्गत काशीखंड में वर्णित है।
बनारसीपन यानी मौज- मस्ती का दूसरा नाम..। शायद ही वर्तमान समय की इस दौड़भाग भरी जिंदगी में कहीं लोगों को मौज मस्ती के लिए भरपूर फुर्सत मिलती हो लेकिन काशीवासी इस मामले में धनी हैं। तमाम काम के बावजूद लोग अपने और दूसरों के लिए समय निकाल ही लेते हैं। वहीं, काम के दौरान माहौल को हल्का फुल्का बनाने की कला बनारसियों का स्वाभाविक गुण है। महादेव की नगरी में बिना भांग खाये भी लोगों के बातचीत का लहजा अल्हड़पन लिए रहता है। एक बात जो बनारसियों के मौजमस्ती का ट्रेडमार्क बन गयी है वह है गंभीर से गंभीर मसले पर भी मुंह में पान घुलाते हुए बात करना।

काशी जितनी महान नगरी है, उतने ही महान यहाँ के कलाकार हैं। जिस नगरी के बादशाह (शिव) स्वयं नटराज (कलागुरु) हों, उस नगरी में कलाकार और कला पारखियों की बहुलता कैसे न हो? बनारस का लँगड़ा इंडिया में ‘सरनाम’ (प्रसिद्ध) है,

ठीक उसी प्रकार बनारस का प्रत्येक कलाकार अपने क्षेत्र में ‘सरनाम’ है। बनारस में यदि कलाकारों की मर्दुम-शुमारी की जाए तो हर दस व्यक्ति पीछे कोई-न-कोई एक संगीतज्ञ, आलोचक, कवि, सम्पादक, कथाकार, मूर्त्तिकार,उपन्यासकार, नाट्यकार और नृत्यकार अवश्य मिलेगा। पत्रकार तो खचियों भरे पड़े हैं। कहने का मतलब यह कि यहाँ का प्रत्येक व्यक्ति कोई-न-कोई ‘कार’ है, बेकार भी अपनी मस्ती की दुनिया का शासक-सरकार है। काशी ही एक ऐसी नगरी है जहाँ प्रत्येक गली-कूचे में कितने महान और अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कलाकार बिखरेपड़े हैं। सब एक-से-एक दिग्गज और विद्वान हैं। इनका पूर्ण परिचय समाचार पत्रों, मकानों में लगी ‘नेमप्लेटों’ और लेटरपैड पर छपी उपाधियों से ज्ञात होता है। वैसे ही गुदरी में लाल खोजने की अपनी प्राचीन परंपरा का निर्वहन करते हुए आज हमने जिस लाल को खोजा है वो अपनी संपूर्ण हुलिया से आचार्य रजनीश के बाऊ लगते हैं इनका चश्मा उतार दे तो आसाराम बापू और टोपी उतार दे लकड़सुंघवा लगने लगेंगे . दिखने में ये कुछ भी लगें लेकिन सच तो यह है की इनकी कलई खोलना शुरू की जाय तो भोर हो जायगी, उसके लिए एक अभिन्दन पत्र नाकाफी होगा, कई टन कागज लग जाएंगे, विस्तार में आप चित्रकार,शिल्पकार, दार्शनिक, कवि, चिंतक, वैज्ञानिक और सार में चैंपियन आफ आल भी हैं, आपका शुभ नाम है  शान्तिरंजन गंगोपाध्याय .












पिता कालिपद गंगोपाध्याय और माता कमल कामिनी देवी के सौजन्य से उनके कनिष्ठ पुत्र के रूप के में आप १५ जनवरी १९३० को बिहार के पुर्णिया जिले की  भूमि पर टपके थे . बचपन में आप इतनी जोर से पादते- हगते थे कि जल्दी आपको कोई गोदी में नहीं लेता था . लेकिन एक कहावत है न, होनहार बिरवान के होत चिकने पात ,सो बचपन से ही आपने अपने अन्दर धधक रही कई प्रतिभाओं  को हवा देना शुरू कर दिया . सोने में सुहागा यह कि शांतिनिकेतन में आपको दुनिया भर में नाम कमाए शिल्पाचार्य श्री नंदलाल बसु , प्रोफेसर धीरानंद,संतोष भाजा और हीरालाल मुखर्जी जैसे महान कलाकारों का सानिध्य मिला जिन्होंने आपके अन्दर किलोलें मार रही चित्रकला, मूर्तिकला, पात्रकला, टेक्स्टाइल  पेंटिंग आदि हुनरों को हवा देकर तराशा,उन्हें नए तेवर दिए .




इसके बाद आप निकल पड़े अपनी साधना यात्रा पर . देश में कई स्थानों पर प्रदर्शनीयों  की सजावट काम  किया जिससे नेहरु जी और राजेंद्र प्रसाद जैसी बरी हस्तियों से भी आपकी निकटता बनी .सर्वोदयी नेता जयप्रकाश नारायण ने  आपको अपने आश्रम बुला लिया जहाँ आपने उनके विचारो को अपने  शिल्प  में उतार कर अनेक ऐसी कालजई कृतियाँ बनाई जो आज तक वहाँ  की शोभा बढ़ा रही हैं और आप उन्हीं को अपने जीवन की श्रेष्ठ कृतियाँ भी मानते हैं .आपकी लाइफ में बरा टर्निंग प्वाईंट तब आया जब १९५८ में आपने राजस्थान में एक प्रदर्शनी की सजावट की .उसे वहां पहुंचे एक जपानी प्रतिनिधि मंडल ने खास पसंद किया  और आपसे जापान चलने को कहा . लेकिन आप ठहरे पक्के बनारसी मस्ती के बनारस वाले , तब केवल नाम ही कमाया था,खर्चा-पानी के मामले में सिफर थे. सो जेपी से निकटता के चलते उन्होंने आपकी जापान यात्रा का सारा जुगाड़ करवा दिया. इमेदा सांग ने आपको जापानी सिखाई और आप उड़ चले जापानवहां आपने मुशाशितों फाईन आर्ट्स यूनिवर्सिटी में शिक्षा ग्रहण की, कई प्रदर्शनियां भी लगाई जिनसे आपकी चर्चाएँ टीवी तक पहुंच गई .आज अपनी सफेद दाढ़ी में ये भले ही आपको लकरदाता लगे पर उस जबानी में काली फ्रेंच कट दाढ़ी में कातिलाना आशिक भी लगते थे .जापान में के इक इंस्टेंट खाध पदार्थ की दुकान पर अपना पेट पूजने जाना शुरू किया .वहां दुकान मालिक की बिटिया कुमको जो आपको पहले से ही  टीवी पर देख-जान चुकी थी, आप पर लट्टू हो गई बस फिर क्या था, उसके परिवार में लाख विरोध होता रहा लेकिन आप उसे विधिवत ब्याह कर, भारत लाकर ही माने .

बाबा के इस हेड आफिस काशी में आकर आपने माँ गंगा के किनारे पांडेघाट पर अपना स्थाई डेरा जमाया, क्षेत्रीयजनों के सामूहिक श्रमदान से घाट साफ करके उसे नया कलेवर दिया. दो संताने पैदा की और वहीँ एक नन्हा सा जापानी होटल भी खोल दिया.इस होटल में घाट की तरफ एक हैंगिंग गार्डन भी लटका दिया जिसे पर्यटक आज भी उसी अजूबे की तरह तजबिजते जैसी टीवी पर राखी सावंत को तजबिजा जाता है .
यहाँ आकर भी आपने अपने हुनर विराम देकर मोर्चा अंत में नहीं लगने दिया.बसंत कालेज, राजघाट में कला प्रवक्ता, ब्रज्पालदास जी के प्रतिष्ठान में साड़ीयों पर कलात्मक छपाई के निर्देशक के रूप में प्रशंसनिय कार्य किए .
अनेक संस्थाओं में कला सलाहकार और पर्यटन गाइड का भी काम किया आप कलम के खासे शातिर है .
कविताई का भूत भी आप पर १९५२ से ही सवार हो गया था जब आपकी पहली कविता बंगाली की ‘सुचित्रा पत्रिका’ में छपी थी इसके बाद अब तक, आगुन’, प्रीति बौल, तत्व बोध नामक तीन काव्य संग्रह, प्रकाशित हो चूके हैं ‘द आर्ट आफ ‘शांतिरंजन गंगोपाध्याय’ शीर्षक से एक पुस्तक भी जापान में छप चुकी है इसकेअलावा आप देश-विदेश के अनेक विधालयों में कला के प्रतिष्ठत प्रशिक्षकों के पद पर समानपुर्वक कार्य भी कर चुके है १९७१ में आपने विप्पति काल में हवाई जहाज को बचाने की ऐसी विधि प्रस्तुति की थी जिसे तत्कालीन अखबारों ने प्रमुखता से छपा  था लेकिन कापिराईट के मामले पर सहमती न बन पाने के कारण इसका प्रदर्शन न हो सका आपकी सैकड़ो अन्य योग्यताएं एक लेकिन बतौर बनारसी मस्ती के बनारस वाले ठलुआ , आपकी कोटि अत्यंत उच्च है ठलुआ चरित्र को प्रमाणित और चरितार्थ करता आपका नाम ही है –शांति ,रंजन (अर्थात मनोरंजन ),गंगो (यानि गंगा) और यानि उपरांत का अध्याय ठलुआ को और क्या चाहिए यहाँ तो खता-पिता परिवार, बाल बच्चे, गंगा का किनारा, टंच स्वास्थ और एक ‘फारेन’ की वाइफ भी मौजुद है आपका दर्शन है की मां-बाप ने आपको संभोग द्वारा यहाँ भोगने के लिए  पैदा किया है सो भोगना ही अपनी नियति है चाहे वह राजभोग हो या कष्ठभोग जो अच्छा बुरा किया या करना बाकी है सब का श्रेय ऊपर वाला को जाता है ..

बनारसी मस्ती का दल जब आपके निवास पर आप का साक्षात् दशन करने पहुंचा तो यह देख कर दंग रह गया की आप जिस रजाई को हटा कर उठे उसमे से एक अदद पिल्ला भी निकला, एक अदद बिल्ली भी ऐसे समरसी और जिवंत बनारसी मस्ती करते हुए हम खुद को भी गौरवान्वित अनुभव कर रहे है गंगा मैया से प्रार्थना है  की आपकी जीवन ज्योति ऐसे ही जलती रहे, दाढ़ी ऐसे ही फलती रहे, बारी ऐसे ही चलती रहे, मृत्यु हाथ मलती रहे, मिजाज में मस्ती हलती रहे ऐसी ही भर-भर खचिया शुभकामनाओं के साथ कागज ख़त्म होने के चलते हम यह संवाद भी ख़त्म करते  हैं और अंत  में चलते-चलते आपको ‘ठलुआ माहर्षि’ की दुर्लभ उपाधि से विभूषित करते है,आपकी जय-जय  करते हैं  .




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1 comments:

Unknown said...

सराहनीय प्रयास

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बनारस शिव से कभी मुक्त नही, जब से आये कैलाश न गये। बनारसी की मस्ती को लिखा नही जा सकता अनुभव होता है। अद्भूद है ये शहर जिन्दगी जीनेका तरीका कुछ ठहरा हुआ है पर सुख ठहराव में है द्रुतविलंबित में नही. मध्यम में है इसको जीनेवाला है यह नगर। नटराज यहां विश्वेश्वर के रुप में विराजते है इसलिये श्मशान पर भी मस्ती का आलम है। जनजन् शंकरवत् है। इस का अनुभव ही आनन्द है ये जान कर जीना बनारस का जीना है जीवन रस को बना के जीना है।
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काल हर !! कष्ट हर !! दुख हर !! दरिद्र हर !! हर हर महादेव !! ॐ नमः शिवाय.. वाह बनारस वाह !!