साँड़ बनारसी

इलाहाबादी, मुरादाबादी और बनारसी आदि शब्दों के आगे-पीछे यदि अमरूद, लोटा, लँगड़ा आम जैसे शब्द न जोड़े जाएँ तो इसका अर्थ होगा - इन शहरों के निवासी। उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जहाँ के शहरों के नाम के  पीछे ‘ई’ लगा देने से उसका अर्थ वहाँ के निवासी से हो जाता है जैसे बनारसी, मलीहाबादी, आजमगढ़ी, सहारनपुरी, गोरखपुरी, रामपुरी, इलाहाबादी, मिरजापुरी और फर्रुखाबादी आदि। किसी शहर में बस जाने का यह मतलब नहीं कि उस व्यक्ति को उस शहर का निवासी मान लिया जाए। अक्सर आपने लोगों को कहते सुना  होगा - ‘भाई, गाँव जाना है।’ ‘देश में बहिन की शादी है’ ‘घर पर हालत ठीक नहीं, रुपये भेजने हैं’ आदि। इससे यह स्पष्ट है कि वह व्यक्ति मौजूदा समय जहाँ है, उसे अपना शहर नहीं मानता और न वहाँ का रजिस्टर्ड बाशिन्दा हो गया है - इसे स्वीकार करता है, रोजी-रोजगार के लिए टिका हुआ है। भले ही वह बाहर जाकर अपने को उस शहर का निवासी घोषित करे, लेकिन मन, वचन और कर्म से वह उस शहर का निवासी नहीं है। ठीक इसी प्रकार बनारस में रहनेवाले सभी बनारसी नहीं हैं।

बनारसी कौन?
आखिर असली बनारसी है कौन? उनकी पहचान क्या है? पहले आपको यह जान लेना चाहिए कि बनारसी कहना किसे चाहिए। बनारस में पैदा होने या पैदा होकर मर जाने से बनारसी कहलाने का हक हासिल नहीं होता। इस प्रकार के अनेक बनारसी नित्य पैदा होते हैं और मरते हैं। क्या वे सभी बनारसी हैं? कभी नहीं। बनारस में पैदा होना, बनारस में आकर बस जाना या बनारसी बोली सीख लेना भी बनारसी होने का पक्का सबूत नहीं है। हिन्दुस्तान को इस बात का फख़्र है
कभी कभी पढ़ते पढ़ते कोई विचार दिमाग में छा जाता है और उस पर चिंतन मनन करना ही पड़ता है . रांड सांड सीढ़ी सन्यासी, इनसे बचो तो कबहु न होई हानि ... ये वाक्य मैंने कहीं पढ़े हैं पर याद नहीं आ रहा है की मैने किस पुस्तक में पढ़ा है और कौन इसके लेखक हैं .

 
काशी के बारे में एक उक्ति है... रांड सांड सीढ़ी सन्यासी इनसे बचे तो सेवे काशी.

तो ये सीढ़ी काशी की सीढ़ी है...
काशी तीन लोक से न्यारी है। वह शेषनाग के फन पर अथवा शंकर के त्रिशूल पर स्थित है। चूँकि काशी बाबा की राजधानी है, जाड़े के दिनों में वे यहीं रहते हैं, गर्मी में पहाड़ पर आबोहवा बदलने चले जाते हैं, इसलिए यह जरूरी है कि साँड़ अपने मालिक के राज्य में काफी तादाद में रहें, क्योंकि ज़माना तटस्थ रहते हुए भी गुर्राहट और हमले की आशंका से भयभीत है। ऐसी हालत में पता नहीं, कब किसकी और कितनी संख्या में जरूरत पड़ जाए। यही कारण है कि काशी को अपना अस्तबल समझकर साँड़ इतनी आजादी से रहते हैं।


ऐसे ही बनारसी साँड़ के ब्याख्या में बनारस के संस्कारो के संरक्षक श्री सुदामा तिवारी (साँड़ बनारसी ) जिनका एक छोटा सा परिचय 


जौनपुर से २२ कि.मी. दक्षिण और पश्चिम के कोने पर ग्राम-गहलाईं,  वर्तमान में पोस्ट- तेजगढ़,  जिला-जौनपुर में एक साधारण किसान पिता स्वं. विश्वनाथ तिवारी,  माता स्व. नर्मदा तिवारी के परिवार में १३ अप्रैल १९४२ को जन्म हुआ था । ६ वर्ष की  अवस्था मे उनके पिता का देहांत हो गया था । उसी वर्ष उनके बडे भाई का भी अल्पायु में निधन हो गया |

उनकी बुआ उन्हें  १९४६- ४७ में बनारस ( वाराणसी ) लेकर आ गईं और अगस्तकुंड मुहल्ले में रहते हुये टेढीनीम से प्राइमरी स्कूल और उसके बाद सनातन धर्म इंटर कालेज मे पढना प्रारंभ किया । प्रतिकूल परिस्तिथियों के कारण पढाई रुक-रुक कर होती रही |

उनके पिता के स्वर्गवास के बाद उनके पिता के चाचा स्वं. रांमानन्द तिवारी उनके पिता की खेती बारी देखने लगे,  और उन्हें पुत्रवत स्नेह देकर कार्य करने लगे और वह अन्त तक उनके साथ रहे और १९९१ में उनका स्वर्गवास हो गया |

१९६५ मैं उनकी माता जी का भी स्वर्गवास हो गया और उसी समय उनकी शादी भी हो गई लेकिन उनका गाव से भी बरांबर आना-जाना रहता था |


कविता और पैरोडी लिखने की आदत उनकी सनातन धर्म इण्टर कालेज से प्रारम्भ हो गई थी । उन्होंने नौकरी  के साथ-साथ काशी विद्यापीठ से शास्वी एवं एम.ए. समाजशास्त्र बिषय से किया केवल ज्ञान बढाने के लिये । तब तक वो काफी चर्चित हो चुके थे । चकाचक बनारसी एवं स्व. चन्द्रशेखर मिश्र , भइया जी बनारसी,  श्री धर्मशील जी के सहयोग से वाराणसी में लोग जानने सुनने लगे थे । एक कबि सम्मेलन के दौरान गोरखपुर में स्वं. श्याम नारायण पाण्डेय जी  ने उनके डील-डौल एवं शरीर को देखने के बाद कविता सुनकर कहा कि तुम तो साँड़ की तरह लग रहे हो । उस समय स्वं. रूप नारायण त्रिपाठी , स्व. क्षेम , स्व. सुड़ फैजाबादी , स्वं. चन्द्रशेखर मिश्र आदि सबने उनका समर्थम किया और उनका कवि उपनाम साँड़ बनारसी रख दिया गया |  

धीरे- धीरे यह नाम प्रचलित होता गया । मंचों पर कविता पढने का अवसर व उन्हें आगे बढाने में स्वं. चन्द्रशेखर मिश्र एवं स्व. सुड़ फैजाबादी ज्यादा थे । बनारस में चकाचक बनारसी, श्री धर्मशील चतुर्वेदी जी एवं साँड़ बनारसी जी की ही तिकडी ज्यादा सक्रिय रही । अब बनारस में सिर्फ  श्री धर्मशीत्न जी श्री साँड़ बनारसी जी ही है,  उनको धीरे- धीरे लगभग सभी शहरों में काव्य पाठ का अवसर प्राप्त हुआ | कवितायें उस समय दैनिक आज में छपने लगीं जिसे भइया जी बनारसी ने काफी प्रोत्साहित किया |

अभी वो जे.ईं॰ पद से अवकाश ग्रहण कर चुके है । उन्होंने १९५९ में आई.टी.सी. (बी.एच.यू. से इंडस्ट्रियल  ट्रेनिग सेन्टर से ) ट्रेनिग करके डी.एल.डब्लू में अपरेन्टिस में भर्ती हो गए और दो वर्ष के बाद वो कर्मचारी के रूप में स्थाई रूप से काम करने लगे |

श्री साँड़ बनारसी जी बिहार एवं प्रदेश के लगभग सभी शहरों में काव्य पाठ कर चुके है | प्रदेशों में राजस्थान, पजाब, कश्मीर, म.प्र., गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र ( मुम्बई ), कोलकाता, उडीसा, हरियाणा, नैनीताल, अल्मोड़ा, देहरादून यानि पूरे भारत में केवल केरल को छोडकर । बाद में दो चार बार अमेरिका भी जाने का अवसर प्राप्त हुआ |

उनकी कविता का अंदाज वो जिस स्वर में पढते है उसे श्रोता पसंद भी करते है, वो हमेशा स्वान्तः सुखाय सवैया और कवित्त, पैरोडी, हास्य लिखने का महारथ हासिल है, समय के अनुसार उनके मन में जो भी उद्गार आते है वो लिख डालते है |


वो अपने माता-पिता की पाँच सन्तानों में चार बहनों एबं एक मात्र में ही पुत्र है | आज उनके दो पुत्र एवं दो पुत्रियाँ हैं बड़ा पुत्र रेलवे में एवं छोटा एडवोकेट हैं । आज के परिवेश में सिर्फ चुनिन्दा कवि सम्मलेन ही करते है लेकिन अपनी संस्था का ही आयोजन परिश्रम के साथ करते है |

मान सम्मान में उन्हें चकल्लस सम्मान, ठहाका सम्मान, सुड़ फैजाबादी सम्मान, चकाचक बनारसी सम्मान, शारदा सम्मान, हुडदंग सम्मान,  स्वं. कैलाश गौतम रजत मुकुट सम्मान जैसे कितने सम्मान से आप अलंककृत है आज भी आप आकाशवाणी से दूरदर्शन तक अपने चहेतों के बीच में अपने काब्य पाठ के माध्यम से हमारे दिल में बैठे है |



काशी में बनारस की सभ्यता के अनुरूप वो हर आयोजन से जुड़े रहते है , वो अत्यंत भावुक, संवेदशील और सहृदय ब्यक्ति है , साँड़ बनारसी जी गीत, पैरोडी, भले ही लिखी हो , परन्तु मूलतः प्राचीन छंद के ही इर्द गिर्द रहते है |


काब्य की विविधता के साथ ही बेलाग प्रस्तुतीकरण में महारथ हासिल करने के कारण श्रोताओ का भरपूर सहयोग और स्नेह मिलता रहा है , दो बार तो अमेरिका में भी अपनी हनक पहुचाने वाले साँड़ बनारसी काशी की हास्य परंपरा से लोगो को आनंदित किया है |

विषय वस्तु में भी वैश्विध्य इनकी विशेषता है , किसी भी अवसर पर झटपट रचना कर लेना आप का कौशल है, आप अमेरिका में भी अपने मित्रो के साथ वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की उची ईमारत के अवलोकन के बाद उनकी ये रचना की दिल को छु जाती है |




आज मनोरंजन के जिस संस्कार को विकार रहित, दूषण रहित , साहित्य को जिन्दा रखे है, ब्यंजना तथा अन्य अलंकारो में इतनी सजावट है की वो मुर्दा दिलो को भी गुदगुदा सकते है |

पता :
श्री सुदामा तिवारी (साँड़ बनारसी )
डी . ३६/१९८ , अगस्त कुंड, गौदोलिया
वाराणसी
मोबाईल : ९४५०५२८७७७  
 

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • RSS

रेल टिकट कन्फर्म होगा कि नहीं,

रेलवे का वेटिंग टिकट कंफर्म होगा कि नहीं इसको लेकर यात्री परेशान रहते हैं. उहापोह की स्थिति बनी रहती है. अब उन्हें इस झंझट से मुक्ति मिलेगी.

         http://confirmtkt.com/  बताता है वेट लिस्ट टिकट कन्फर्म होंगी कि नहीं

कैसे डेवलप हुई वेबसाइट
इस वेबसाइट को दो इंजीनियरों दिनेश और श्रीपद ने बनाया है. दिनेश ने एनआइटी, जमशेदपुर से जबकि श्रीपद ने सास्त्र यूनिवर्सिटी, तंजौर से पढ़ाई की है. ये दोनों आइबीएम में काम करते थे. टिकट कंफर्मेशन की परेशानी ङोलने के बाद इसका उपाय खोजने में लग गये और कामयाब हुए. रेलवे बोर्ड इन दोनों को सम्मानित कर सकती है. दोनों युवाओं ने टिकटों के कंफर्म होने के टाइमिंग का पता लगा कर आंकड़ों का विेषण किया. शुरुआत में वेबसाइट की सटीकता(एक्यूरेशी) 88 फीसदी थी जो बढ़ कर 94 फीसदी हो गयी है.

कैसे काम करेगी वेबसाइट
यह वेबसाइट लोगों की सोच की तरह काम करता है. जैसे लोगों को अपने अतीत के अनुभवों से सीख मिलती है. उसी तरह यह वेबसाइट हर ट्रेन की वेटिंग लिस्ट टिकट के इतिहास के आधार पर भविष्यवाणी करेगा. यह इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह प्रयोगकर्ताओं के अनुभवों को भी समेटता जायेगा.

स्मार्टफोन के लिए स्मार्टएप्प भी
तकनीकी युग में जहां रिचार्ज से लेकर शॉपिंग तक मोबाइल एप्लीकेशन के रूप में मौजूद है, ऐसे में इस वेबसाइट ने भी स्मार्टफोन पर अपना स्मार्ट एप्प जारी किया है. इस वेबसाइट के एंड्रॉयड एप्लीकेशन को मोबाइल फोन में डाउनलोड किया जा सकता है. यह एप्प वेटिंग लिस्ट टिकट के बारे में भविष्यवाणी करके बतायेगा कि आपका टिकट कंफर्म होगा या नहीं. वेटिंग टिकट की स्थिति में यह आपको मेल करके सूचित करता है कि आपके वेटिंग लिस्ट टिकट के कंफर्म होने की संभावना कितनी है. उसके कंफर्म होने पर आपको सूचना भी देता है.
दो युवा इंजीनियरों ने इसका समाधान एक वेबसाइट के रूप में निकाल लिया है. रेलवे बोर्ड इन युवा इंजीनियरों को सम्मानित करने पर विचार कर रहा है.

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • RSS

पहले से बनारस को बना रहा जापान

विश्व के सबसे पुराने शहरों में शुमार बनारस को जापान के सहयोग से वहां के हेरिटेज सिटी क्योटो की तर्ज पर डवलप करने का प्लैन भले नया हो लेकिन सच ये भी है कि जापान बनारस को पहले से बना रहा है. पड़ गये न चक्कर में? जी हां, ये एक बड़ा सच है. कैसे जापान से जुड़ा हुआ है बनारस.. ये भी जानिये हमारी आज की रिपोर्ट में.
सारनाथ, गंगा, घाट की शान बढ़ा रहा जापान
- सारनाथ में जापान कर चुका है बौद्ध मंदिर के साथ शांति स्तूप का निर्माण
- अब गंगा एक्शन प्लैन के तरह अरबन डवलपमेंट के प्रोजेक्ट्स में कर रहा हेल्प
- जापानी एजेंसी जायका ने घाटों के ब्यूटीफिकेशन के लिये किये हैं तमाम जतन

VARANASI : अपने देश पीएम और बनारस एमपी नरेन्द्र मोदी ने बनारस को जापानी हेरिटेज सिटी क्योटो के

तर्ज पर डवलप करने के लिये जापान से समझौता किया है. इस ताजा खबर ने बनारस के डवलपमेंट की एक नई आस जगा दी है. जापान का हेरिटेज सिटी क्योटो आज वहां के स्मार्ट सिटीज में एक है. एडवांस होने के बावजूद क्योटो अपनी तमाम धरोहरों को संजोये है और इसमें से कुछ व‌र्ल्ड हेरिटेज में भी शामिल हैं. कुछ ऐसा ही जापान गवर्नमेंट की हेल्प से बनारस में होगा. ये पहला मौका नहीं जब जापान बनारस के डेवलपमेंट के लिए आगे आया है. यहां तो काफी पहले से ही जापान विकास की बयार बहाये हुए है.

चल रहे हैं कई प्रोजेक्ट

जापान की संस्था जापान इंटरनेशनल कोआपरेशन एजेंसी (जायका) गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने की पहले से हेल्प कर रही है. गंगा एक्शन प्लान के तहत नेशनल गंगा बेसिन एथॉरिटी की रूपरेखा के अनुसार ब्97 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट है. प्रोजेक्ट को दो हिस्सों में बांटा गया है. गंगा में गिरने वाले सीवेज को रोकने का काम जल निगम करा रहा है. वहीं नान सीवेज व‌र्क्स को नगर निगम पूरा कर रहा है. इस प्रोजेक्ट में जायका की ओर से ब्97 करोड़ रुपये की फंडिंग की गयी है. जायका से सहयोग से सीवरेज के कामों सबसे महत्वपूर्ण सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण है. इसके साथ फ्ब् किलोमीटर नयी सीवर लाइन बिछाने और पुरानी सीवर लाइन को दुरुस्त करने का काम है. नान सीवरेज वर्क के तहत ख्म् घाटों का रिनोवेशन होना है. घाटों के आसपास ब्0 कम्यूनिटी टायलेट काम्प्लेक्स बनना है. सात धोबी घाट के साथ पब्लिक को अवेयर करने का काम भी जायका नगर निगम के सहयोग से कर रहा है.

एक दशक पहले तय हुई रूपरेखा

बनारस को बदले की रूपरेखा एक दशक से पहले बनी थी. वर्ष ख्00क् में तत्कालीन प्रधानमंत्री के जापान दौरे के वक्त गंगा को प्रदूषण से मुक्त कराने की योजना को अमली जामा पहनाया जा सका. इसके बाद जापान के विशेषज्ञों की टीम ने शहर में आकर गंगा की स्टडी की. प्रोजेक्ट तैयार किया. ख्00फ् में तय प्रोजेक्ट के तहत काम शुरू हो गया. एक ओर जल निगम तो दूसरी ओर नगर निगम जायका के सहयोग से काम करते रहे. इस दौरान जापान के विशेषज्ञों की टीम लगातार गाइड करती रही. समय-समय पर जरूरत होने पर प्रोजेक्ट में कुछ जोड़ा गया तो कुछ घटाया गया.

सारनाथ को दिया मंदिर

जापानियों के लिये सारनाथ एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है. काफी समय पहले से ही यहां जापानी बौद्ध फालोअर्स आते-जाते रहे हैं. इसे ध्यान में रखते हुए जापान के धर्मचक्र इंडो जापान बुद्धिस्ट कल्चरल सोसाइटी ने सारनाथ में एक बुद्ध मंदिर की आधारशिला ख्फ् साल पहले रखी. यह मंदिर फ्0 सितंबर क्98म् में बनना स्टार्ट हुआ. दो साल में ही जापानी स्थापत्य कला पर आधारित इस मंदिर ने आकार ले लिया. साज सज्जा के बाद जापानी मंदिर श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया. तब से लेकर अब तक इस मंदिर में जापान से आने वाला हर बौद्ध फालोअर शीश नवाने जरूर पहुंचता है.

स्तूप देता है शांति का संदेश

सारनाथ स्थित जापानी मंदिर जहां दुनिया भर के श्रद्धालुओं में श्रद्धा का भाव जगा रहा है तो मंदिर से सटे बना स्तूप शांति का संदेश कोने कोने में फैला रहा है. बता दें कि मंदिर कैंपस से सटे ही जापानी सोसाइटी ने शांति का मैसेज देने के लिए एक स्तूप स्थापित किया है. जहां पहुंचे श्रद्धालु अपने साथ शांति का संदेश भी लेकर वापस लौटते हैं.

मदद के बावजूद बदहाली


जहां जायका बनारस के विकास में मदद के लिये हाथों हाथ तैयार है वहीं काफी कुछ होने के बाद बदहाली के निशान मिट नहीं रहे. देखिये एक नजर में..

-जायका की ओर से मिली बड़ी धनराशि से काम तो शुरू हो गया लेकिन रिजल्ट अच्छा नहीं है.

-अभी तक लगभग तीन सौ करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं लेकिन काम को पूरी गति नहीं मिली है.

- वरुणापार एरिया के सीपेज को गंगा में गिरने से रोकने के लिए सीवर लाइन बिछा दी गयी है.

- ट्रीटमेंट प्लांट के लिए जमीन तय नहीं हो सकी. पहले संथवां में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनना था.

-जमीन नहीं मिल पाने की वजह से ट्रीटमेंट प्लांट टाइम लिमिट से काफी लेट हो चुका है.

-पुरानी सीवर लाइन की मरम्मत का काम भी पूरा नहीं, तीन में से एक पम्पिंग स्टेशन ही बना है.

- -कम्यूनिटी टायलेट काम्प्लेक्स भी अधर में, धोबी घाट नहीं बने और घाटों का रिनोवेशन भी शुरू नहीं.

-मणिकर्णिका, हरिश्चंद्र, अस्सी घाट जिनका रिनोवेशन जायका टीम ने किया, उसे पब्लिक ने बर्बाद कर डाला है.

समझौते से क्या होगा जब ये है हाल


-जापान के साथ बनारस को डेवलप करने का नया करार कितना कारगर होगा यह तो वक्त बताएगा.

- हर प्रोजेक्ट में केंद्र और राज्य सरकार के बीच सामंजस्य की कमी सबसे बड़ी अड़चन बनती है.

- विभिन्न विभागों के बीच तालमेल न होने से भी टेक्निकल इश्यूज खड़े होते हैं और प्रोजेक्ट लेट होता है.

- ज्यादातर सरकारी एजेंसियां ठेकेदारों से काम कराती हैं जिनका फोकस लूटने पर रहता है.

- जापानी एक्सप‌र्ट्स की गाइडलाइंस को भी कई बार इग्नोर किया जाता है जिससे मुश्किल आती है.

- लोकल लेवल पर पब्लिक को साथ न लेने से विरोध होता है, संथवा ट्रीटमेंट प्लांट इसका उदाहरण है.

क्योटो से मेल खाती है अपनी काशी

- दोनों ही हेरिटेज सिटीज में काफी कुछ हैं समानताएं, दोनों की ही गिनती होती है प्राचीन शहरों में

पीएम मोदी की ओर से काशी को जापान के क्योटो की तरह डवलप करने के एग्रीमेंट के बाद हो सकता है कि आप सोचें कि क्योटो की तर्ज पर डवलपमेंट क्यों. टोक्यो या नागासाकी की तरह डवलपमेंट क्यों नहीं. दरअसल जिस तरह बनारस पुराने और जीवंत शहरों में शुमार है. उसी तरह क्योटो भी पुराना और जीवंत शहर है. इसके अलावा भी क्योटो और अपनी काशी में काफी कुछ सेम है. ,

- काशी दुनिया की सबसे पुरानी और जीवंत नगरी के रुप में फेमस है.

- क्योटो भी जापान के इतिहास में सबसे पुराने और जीवंत शहरों में शामिल है.

- जिस तरह बनारस देश के धर्म और संस्कृति की राजधानी है वैसे ही क्योटो जापान की धर्म और संस्कृति की राजधानी का बड़ा केन्द्र है.

- बनारस जैसे गंगा, वरुणा और असि नदी से घिरा है वैसे ही क्योटो उजिगावा, कस्तूरगावा और कामोगावा नदियों के किनारे बसा है.

- काशी में भगवान बुद्ध ने अपना उपदेश दिया जबकि क्योटो में भगवान बुद्ध के काफी अनुयायी हैं.

- काशी विश्वनाथ मंदिर के तर्ज पर क्योटो का तोजी मंदिर जापानियों के लिये आस्था का बड़ा केंद्र है.

- व‌र्ल्ड हेरिटेज रिलीजियस प्लेसेज में शामिल तोजी टेम्पल साल भर में कुछ ही दिनों के लिए खुलता है.

- काशी विश्वनाथ मंदिर भी है द्वादश ज्योर्तिलिंगों में शामिल.

- क्योंकि क्योटो एकलौता ऐसा शहर जो जापान में सेकेंड वर्ड वार के बाद भी अपनी स्थिति में खड़ा रहा इस वजह से इस धार्मिक शहर के प्रति आस्था और मजबूत हुई.

- जैसे बनारस में हजारों की संख्या में शिवालय हैं वैसे ही क्योटो में ख्000 से ज्यादा धर्मस्थल हैं.

इसलिये भी स्पेशल है क्योटो

- ख्000 से ज्यादा धर्म स्थल हैं क्योटो में.

- क्म्00 बौद्ध मंदिर और ब्00 शिंतों धर्मशालाएं हैं यहां.

- ख्0 परसेंट धरोहरें, क्ब् सांस्कृति संपत्तियां हैं मौजूद.

- क्7 स्थान यूनेस्को की विश्व सांस्कृतिक धरोहरों में हैं शामिल.

- हाईस्पीड ट्रेनों समेत बेस्ट परिवहन सेवा है क्योटो में.

- पयर्टकों का आकर्षित करने के लिए इस सांस्कृतिक नगरी को किया गया है वैसे ही डेवलप.

- हर साल तीन करोड़ पर्यटक पहुंचते हैं क्योटो, इससे जापान की इकोनॉमी को होता है फायदा.

- इसी तर्ज पर बनारस को धार्मिक और सांस्कृति नगरी के तौर पर डेवलप कर पर्यटकों को लाने की है प्लैनिंग.

क्योंकि जापान समेत हर देश के लिए हैं खास

- बनारस और शहरों की तुलना में अलग है इसलिए यहां हर साल दुनिया भर से लाखों पर्यटक यहां आते हैं.

- शहर की आबादी है लगभग क्8 लाख से ज्यादा.

- पर्यटन विभाग के मुताबिक हर साल बनारस आने वाले पर्यटकों की संख्या होती है लगभग चार से पांच लाख.

- इनमे जापान के टूरिस्ट्स की संख्या भी होती है एक से डेढ़ लाख.

- जापान से आने वाले अधिकतर सैलानी सारनाथ बौद्ध दर्शन के लिए आते हैं.

- इसके अलावा थाईलैंड, श्रीलंका समेत कई दूसरे बौद्ध देशों से भी भारी संख्या में पर्यटक यहां आते हें

बहुत अच्छा होगा अगर ये होगा


- मोदी और जापान सरकार की ओर से काशी और क्योटो के समझौते को लेकर खुश हैं काशी में रहने वाले जापान के लोग काशी हर किसी को अपनाती है. यही वजह है कि यहां हर साल इस शहर की संस्कृति से प्रभावित होकर दर्जनों विदेशी यहीं के होकर रह जाते हैं. ऐसे ही कुछ जापानी नागरिक भी हैं जो आये तो थे काशी घूमने लेकिन फिर यही पर बस गए. इनमें से कुछ से हमने बात की और जानी उनकी राय जापान और भारत के इस समझौते पर.

आई ओर बस गई

ऐसी ही एक हैं सारनाथ में रह रही मिहो ईवाई जैन. मिहो बताती हैं कि ख्00ख् से पहले वह परिवार के साथ सारनाथ घूमने आई थी और यहां उनकी मुलाकात सारनाथ के अजय जैन से हुई. तब अजय स्टूडेंट थे. इन दोनों में बातचीत शुरू हुई और देखते ही देखते दोस्ती प्यार में बदल गई और मिहो ने अजय को अपना जीवन साथी बनाने के बाद जापान छोड़कर सारनाथ में ही रहना ठीक समझा और अब मिहो अजय के साथ यही पर पिछले क्ख् सालों से रह रही हैं. जापान के हिमेजी की रहने वाली मिहो बताती हैं कि ये समझौता निश्चित ही काशी की तकदीर बदलने का काम करेगा और काशी को वह सब मिलेगा, जिसकी वह हकदार है. वहीं पाण्डेयघाट पर ब्0 साल पहले आकर यही के शांति रंजन गंगोपाध्याय से शादी रचाकर यही के हो जाने वाली कोनिको का कहना है कि सरकार का ये कदम वेलकम करने वाला है क्योंकि यहां हर साल काफी जापानी टूरिस्ट आते हैं लेकिन उनको ये शहर अपना नहीं लगता. अब इस शहर की सूरत बदलेगी. इसके अलावा विश्वनाथ गली में जापान के कोबे से आकर बसी मेगूमी हिसादा का कहना है कि ख्00फ् में वह काशी और यहां के संजय से शादी करके बस गई. मेगूमी का कहना है कि काशी के असल रुप को बनाये रखते हुए क्योटो की तर्ज पर इसका विकास होना चाहिए.


सिद्धार्थ विमल
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • RSS

बनारसी छोरों पर फिदा जापानी बालाएं

Vikas Bagi , वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब जापान गए होंगे तो उन्हें भी इसका इल्म नहीं रहा होगा कि जिस काशी का वह प्रतिनिधित्व करते हैं, वहां के छोरों पर जापानी बालाएं फिदा हैं। जापानी बालाएं आती हैं तो बनारस घूमने, लेकिन गंगा लहरों के बीच दिल हार जाती हैं। गंगा किनारे वाले अल्हड़ छोरों में अपना "प्यार" नजर आता है और उनके साथ जीने-मरने को अपना देश छोड़कर बनारस आ जाती हैं।

एडीएम सिटी का दफ्तर जहां विदेशी नागरिकों से संबंधित शादियां होती हैं, वहां का रिकॉर्ड बताता है 
कि जापान की युवतियां बनारस के लड़कों के साथ शादी करने के मामले में सबसे आगे हैं। हर साल कम से कम तीन से चार जापानी युवतियां बनारसी छोरों के साथ ब्याह रचाती हैं। बीते सात की ही बात करें तो अगस्त में शिवपुरवा के चंदन वर्मा और जापान के ओयामा शहर की जुनको ने एडीएम सिटी दफ्तर में कोर्ट मैरिज की है। पढ़ाई के दौरान दोनों के दिल मिले और फिर साथ जीने-मरने की कसमें खाते हुए चंदन और जुनको ने शादी कर ली।
इसी तरह एक कंपनी में सेल्स मैनेजर भूतेश्वर गली निवासी विक्की पॉल की आंखें कंपनी में ही काम करने वाली जापान के काना ससाकी से चार हो गईं। आज दोनों अपनी जिंदगी से बहुत खुश हैं। तीन साल पहले शास्त्रीय संगीत सीखने की चाह में जापान के नागानू सिटी से आईं 27 वर्षीय काउरू सितार सीखने के दौरान बढ़ई का काम करने वाले खालिसपुर निवासी इरशाद से मुलाकात हुई। उसकी साफगोई और प्यार भरी बातों ने काउरू का दिल जीत लिया। दोनों ने बीते वर्ष दिसंबर में एडीएम सिटी के कोर्ट में मैरिज कर ली। काउरू, रिनाको, कारो, इरिको, जुनको, कागोशिमा की नहीं, दर्जनों ऐसी जापानी बालाएं जो बनारस आकर रिश्तों में बंध गईं।
एडीएम सिटी के यहां मौजूद रिकॉर्ड बताते हैं कि वर्ष 2008 से 2014 के बीच सबसे अधिक जापानी युवतियां पांच वर्ष पूर्व 2009 में फिदा हुईं। पांच युवतियों ने यहां शादी की थी। 2010 में चार, 2011 में तीन, 2012 में दो, 2013 में दो और 2014 में अब तक तीन जापानी युवतियां बनारस को अपना ससुराल बना चुकी हैं।
दौलत नहीं, प्यार को तरजीह
जापान में बीते वर्ष नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन एंड सोशल सिक्योरिटी रिसर्च ने कुंवारी युवतियों से शादी के बाबत राय ली थी तब अधिकांश ने धन-दौलत के बजाय प्यार करने वाले जीवनसाथी को तरजीह दी थी। शायद यही वजह है बनारस के अल्हड़ छोरे जापानियों का दिल जीतने में आगे रहते हैं।


  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • RSS

भगवान श्री स्वामिनारायण का भब्य मंदिर - वाराणसी

भूतभावन भगवान भोलेनाथ की परमपावन मोक्षपुरी काशी नगरी में  मत्स्योदरी तीर्थ पर गायधाट महाँल की सीमा पर भगवान श्री स्वामिनारायण का मन्दिर अत्यन्त रमणीय एवं चित्ताकर्षक है । इस मन्दिर के पीछे दो सौ वर्ष का इतिहास है ।
पूरे गुजरात, सौराष्ट्र, महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश एवं देश -विदेश में फैले हुए श्री स्वामिनारायण संप्रदाय की गुजरात राज्य में  दो प्रमुख गद्दी है । एक वडताल में एवं दूसरी अहमदाबाद में है । काशी स्थित श्री स्वामिनारायण मन्दिर वडताल की श्री लक्ष्मी नारायण देव की गद्दी के अंतर्गत है ।

इस मन्दिर का इतिहास इस प्रकार है - बचपन में भगवान श्री स्वामिनारायण का नाम घनश्याम था , संप्रदाय के श्री हरि दिग्विजय ग्रंथ एवं परम्परागत कथा  के अनुसार भगवान श्री स्वामिनारायण जब दस वर्ष के थे तब पिता धर्मदेव के साथ काशी आये थे और यहाँ के मणिकार्डिका स्थित प्रसिद्ध गौमठ  में ठहरे थे । यहॉ विद्वानों की सभा हुई  जिसमे बालक घनश्याम की विदत्ता देख कर सभी विद्वान अत्यंत प्रभावित हुवे थे | तत्पश्चात भगवान श्री स्वामिनारायण ने अपने पिता के साथ काशी के प्रसिद्द  मत्स्योदरी तीर्थ एवं गायधाट पर स्नान  किया | इसी पुण्य स्मृति में यह दिब्य मंदिर बना है |
मन्दिर के  लिए यह जमीन तो लगभग १५० बर्ष पूर्व ही ली गयी थी लेकिन आज से करीब ६० वर्ष पूर्व  ध. धु . १००८  आचार्य श्री  आनंद  प्रसादजी की आज्ञा से गुजरात के महान तीर्थधाम वडताल के मुख्य कोठारी स . गु . ब्र  स्वामी श्री धर्म स्वरुप दास जी और स . गु . ब्र श्री मायतीतानन्द जी के अतिभारी परिश्रम से  एवं त्यागी संतो की सहायता से तथा हरिभक्ती के आर्थिक मदद से तथा कोठारी श्री खुशाल भाई ने (उक्त महानुभावों की ) सुचना के अनुसार, स्वयं स्रर्वप्रकार से निर्माण कार्य को संभाल कर  इस तीर्थराज काशी में श्री स्वामिनारायण के शिखर बंध मन्दिर का निर्माण  मिस्त्री वजेशंकर लक्ष्मी शंकर के द्वारा कराके उसमे श्री हरिकृष्णा महाराज ( श्री स्वामिनारायण भगवान) श्री लक्ष्मी नारायण देव , श्री काशी विश्वनाथ महादेव की प्राण प्रतिष्ठा  विक्रम संबत १९९८ के वैशाख सूदी (५) पंचमी और सोमवार एबं ता. २४-४-१९४२ के दिन कराई  गयी है ||

इस मंदिर का प्रमुख उद्देश्य भगवान श्री स्वामिनारायण की काशी यात्रा की पुण्य -स्मृति का संरक्षण करना , यात्रियों की सेवा करना एवं भगवत अनुष्ठार्थि व तीर्थवास कर सके तथा संत , विधार्थीयों की ब्यवस्था  द्वारा  सदविद्या  का प्रचार करना है || सदूविद्या - प्रवर्तन से बढ़ कर ज्यादा पुण्यप्रद कोई सत् कर्म नहीं है, अर्थात इससे बढकर भगवत्

प्रसन्नता का कोई साधन नहीं हैं और श्री स्वामिनारायण संप्रदाय का पुरे विश्व के कोने कोने तक प्रचार करने में जिन महानुभाव विद्वान संतो ने प्रमुख भूमिका निभाई उन सभी विद्वान संतो ने इस श्री स्वामिनारायण  मंदिर मन्दिर के जो अपनी मातृ संस्था है, उसका आश्रय लेकर सदविद्या की प्राप्ति की है शिल्प स्थापत्य एवं सुंदरता की दृस्टि से  श्री स्वामिनारायण मंदिर   काशी के  प्रमुख चार-पाँच मन्दिरों में से एक है । सरसरी निगाह से देखने पर उत्तरऱभिमुख यह मन्दिर सुन्दर  रथाकार प्रतीत होता है । मन्दिर के चारों ओर भगवान् के प्रमुख अवतारों शंकर-पार्वती , सरस्वती, गंगा, यमुना, यम और वरुण की प्रतिमा चित्त क्रो आकर्षित करती हैं और मन्दिर के पाँच अनुपम शिखरों पर सुवर्ण कलशा के साथ फहराती ध्वजाएँ मुमुक्षवो को मोक्ष प्रदान करने के लिए मानो आहवान कर रही हो |

निज मन्दिर
मुख्य मन्दिर, जिसको निज मन्दिर कहते है-तीन शिखरों वाला है  जिसमें पूर्व खण्ड में श्री विश्वनाथजी एबं पार्वतीजी अर्चास्वरूप से मूर्तिमान विराजमान होकर भक्तों को
प्रतिदिन इक्छित सुख देते हुवे दर्शन दे रहे है मध्य खण्ड में भगवान श्री स्वामि-नारायण एवं भगवान श्री लक्ष्मी नारायण  देव पंचधातुओँ से निर्मित प्रतिमा स्वरुप से विराजमान हो कर दरसनार्थियो के मन को आकर्षित करते है और अपूर्व शांति प्रदान कर के भक्त के तीन - ताप को हर लेते है मंदिर के पश्चिम खंड में भगवान की सुख शय्या रखी गयी है और श्री राधा कृष्णा एवं भगवान श्री स्वामिनारायणका सुन्दर चित्र और सुखशय्या है | मंदिर में प्रति दिन भगवान का पूजन एवं नूतन शृंगार होता है | मंदिर के उत्तर में प्रवेश द्वार्की सोपान श्रेणी के पास श्री हनुमान जी एवं श्री गणेश जी के मंदिर में शिव - सूर्यनारायण आदि विराजमान है  | सर्व देवो के प्रति आदर भावना  श्री स्वामिनारायण संप्रदाय की प्रमुख विसेसता  है |
मंदिर में संत छात्रावास भी है , मंदिर के आगंतुक यात्रियों के लिए आवास का सुन्दर प्रभन्ध  भी है  और आधुनिक ढंग से विशाल नूतन अतिथि भवन का निर्माण भी हुवा है

| वर्तमान समय में ये भगवान श्री स्वामिनारायण  का भब्य मंदिर सुन्दर कलाकृति का अनुपम नमूना कहा जाता है..

Address :

Shree Swaminarayan Mandir - Kashi

K 1/1, Machhodari Park
Gayghat - 221 001
Kashi, Banaras
Uttar Pradesh(UP)
Tel: +91 542 2435492
India










  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • RSS
बनारस शिव से कभी मुक्त नही, जब से आये कैलाश न गये। बनारसी की मस्ती को लिखा नही जा सकता अनुभव होता है। अद्भूद है ये शहर जिन्दगी जीनेका तरीका कुछ ठहरा हुआ है पर सुख ठहराव में है द्रुतविलंबित में नही. मध्यम में है इसको जीनेवाला है यह नगर। नटराज यहां विश्वेश्वर के रुप में विराजते है इसलिये श्मशान पर भी मस्ती का आलम है। जनजन् शंकरवत् है। इस का अनुभव ही आनन्द है ये जान कर जीना बनारस का जीना है जीवन रस को बना के जीना है।
Copyright © 2014 बनारसी मस्ती के बनारस वाले Designed by बनारसी मस्ती के बनारस वाले
Converted to blogger by बनारसी राजू ;)
काल हर !! कष्ट हर !! दुख हर !! दरिद्र हर !! हर हर महादेव !! ॐ नमः शिवाय.. वाह बनारस वाह !!