रेल टिकट कन्फर्म होगा कि नहीं,

रेलवे का वेटिंग टिकट कंफर्म होगा कि नहीं इसको लेकर यात्री परेशान रहते हैं. उहापोह की स्थिति बनी रहती है. अब उन्हें इस झंझट से मुक्ति मिलेगी.

         http://confirmtkt.com/  बताता है वेट लिस्ट टिकट कन्फर्म होंगी कि नहीं

कैसे डेवलप हुई वेबसाइट
इस वेबसाइट को दो इंजीनियरों दिनेश और श्रीपद ने बनाया है. दिनेश ने एनआइटी, जमशेदपुर से जबकि श्रीपद ने सास्त्र यूनिवर्सिटी, तंजौर से पढ़ाई की है. ये दोनों आइबीएम में काम करते थे. टिकट कंफर्मेशन की परेशानी ङोलने के बाद इसका उपाय खोजने में लग गये और कामयाब हुए. रेलवे बोर्ड इन दोनों को सम्मानित कर सकती है. दोनों युवाओं ने टिकटों के कंफर्म होने के टाइमिंग का पता लगा कर आंकड़ों का विेषण किया. शुरुआत में वेबसाइट की सटीकता(एक्यूरेशी) 88 फीसदी थी जो बढ़ कर 94 फीसदी हो गयी है.

कैसे काम करेगी वेबसाइट
यह वेबसाइट लोगों की सोच की तरह काम करता है. जैसे लोगों को अपने अतीत के अनुभवों से सीख मिलती है. उसी तरह यह वेबसाइट हर ट्रेन की वेटिंग लिस्ट टिकट के इतिहास के आधार पर भविष्यवाणी करेगा. यह इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह प्रयोगकर्ताओं के अनुभवों को भी समेटता जायेगा.

स्मार्टफोन के लिए स्मार्टएप्प भी
तकनीकी युग में जहां रिचार्ज से लेकर शॉपिंग तक मोबाइल एप्लीकेशन के रूप में मौजूद है, ऐसे में इस वेबसाइट ने भी स्मार्टफोन पर अपना स्मार्ट एप्प जारी किया है. इस वेबसाइट के एंड्रॉयड एप्लीकेशन को मोबाइल फोन में डाउनलोड किया जा सकता है. यह एप्प वेटिंग लिस्ट टिकट के बारे में भविष्यवाणी करके बतायेगा कि आपका टिकट कंफर्म होगा या नहीं. वेटिंग टिकट की स्थिति में यह आपको मेल करके सूचित करता है कि आपके वेटिंग लिस्ट टिकट के कंफर्म होने की संभावना कितनी है. उसके कंफर्म होने पर आपको सूचना भी देता है.
दो युवा इंजीनियरों ने इसका समाधान एक वेबसाइट के रूप में निकाल लिया है. रेलवे बोर्ड इन युवा इंजीनियरों को सम्मानित करने पर विचार कर रहा है.

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पहले से बनारस को बना रहा जापान

विश्व के सबसे पुराने शहरों में शुमार बनारस को जापान के सहयोग से वहां के हेरिटेज सिटी क्योटो की तर्ज पर डवलप करने का प्लैन भले नया हो लेकिन सच ये भी है कि जापान बनारस को पहले से बना रहा है. पड़ गये न चक्कर में? जी हां, ये एक बड़ा सच है. कैसे जापान से जुड़ा हुआ है बनारस.. ये भी जानिये हमारी आज की रिपोर्ट में.
सारनाथ, गंगा, घाट की शान बढ़ा रहा जापान
- सारनाथ में जापान कर चुका है बौद्ध मंदिर के साथ शांति स्तूप का निर्माण
- अब गंगा एक्शन प्लैन के तरह अरबन डवलपमेंट के प्रोजेक्ट्स में कर रहा हेल्प
- जापानी एजेंसी जायका ने घाटों के ब्यूटीफिकेशन के लिये किये हैं तमाम जतन

VARANASI : अपने देश पीएम और बनारस एमपी नरेन्द्र मोदी ने बनारस को जापानी हेरिटेज सिटी क्योटो के

तर्ज पर डवलप करने के लिये जापान से समझौता किया है. इस ताजा खबर ने बनारस के डवलपमेंट की एक नई आस जगा दी है. जापान का हेरिटेज सिटी क्योटो आज वहां के स्मार्ट सिटीज में एक है. एडवांस होने के बावजूद क्योटो अपनी तमाम धरोहरों को संजोये है और इसमें से कुछ व‌र्ल्ड हेरिटेज में भी शामिल हैं. कुछ ऐसा ही जापान गवर्नमेंट की हेल्प से बनारस में होगा. ये पहला मौका नहीं जब जापान बनारस के डेवलपमेंट के लिए आगे आया है. यहां तो काफी पहले से ही जापान विकास की बयार बहाये हुए है.

चल रहे हैं कई प्रोजेक्ट

जापान की संस्था जापान इंटरनेशनल कोआपरेशन एजेंसी (जायका) गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने की पहले से हेल्प कर रही है. गंगा एक्शन प्लान के तहत नेशनल गंगा बेसिन एथॉरिटी की रूपरेखा के अनुसार ब्97 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट है. प्रोजेक्ट को दो हिस्सों में बांटा गया है. गंगा में गिरने वाले सीवेज को रोकने का काम जल निगम करा रहा है. वहीं नान सीवेज व‌र्क्स को नगर निगम पूरा कर रहा है. इस प्रोजेक्ट में जायका की ओर से ब्97 करोड़ रुपये की फंडिंग की गयी है. जायका से सहयोग से सीवरेज के कामों सबसे महत्वपूर्ण सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण है. इसके साथ फ्ब् किलोमीटर नयी सीवर लाइन बिछाने और पुरानी सीवर लाइन को दुरुस्त करने का काम है. नान सीवरेज वर्क के तहत ख्म् घाटों का रिनोवेशन होना है. घाटों के आसपास ब्0 कम्यूनिटी टायलेट काम्प्लेक्स बनना है. सात धोबी घाट के साथ पब्लिक को अवेयर करने का काम भी जायका नगर निगम के सहयोग से कर रहा है.

एक दशक पहले तय हुई रूपरेखा

बनारस को बदले की रूपरेखा एक दशक से पहले बनी थी. वर्ष ख्00क् में तत्कालीन प्रधानमंत्री के जापान दौरे के वक्त गंगा को प्रदूषण से मुक्त कराने की योजना को अमली जामा पहनाया जा सका. इसके बाद जापान के विशेषज्ञों की टीम ने शहर में आकर गंगा की स्टडी की. प्रोजेक्ट तैयार किया. ख्00फ् में तय प्रोजेक्ट के तहत काम शुरू हो गया. एक ओर जल निगम तो दूसरी ओर नगर निगम जायका के सहयोग से काम करते रहे. इस दौरान जापान के विशेषज्ञों की टीम लगातार गाइड करती रही. समय-समय पर जरूरत होने पर प्रोजेक्ट में कुछ जोड़ा गया तो कुछ घटाया गया.

सारनाथ को दिया मंदिर

जापानियों के लिये सारनाथ एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है. काफी समय पहले से ही यहां जापानी बौद्ध फालोअर्स आते-जाते रहे हैं. इसे ध्यान में रखते हुए जापान के धर्मचक्र इंडो जापान बुद्धिस्ट कल्चरल सोसाइटी ने सारनाथ में एक बुद्ध मंदिर की आधारशिला ख्फ् साल पहले रखी. यह मंदिर फ्0 सितंबर क्98म् में बनना स्टार्ट हुआ. दो साल में ही जापानी स्थापत्य कला पर आधारित इस मंदिर ने आकार ले लिया. साज सज्जा के बाद जापानी मंदिर श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया. तब से लेकर अब तक इस मंदिर में जापान से आने वाला हर बौद्ध फालोअर शीश नवाने जरूर पहुंचता है.

स्तूप देता है शांति का संदेश

सारनाथ स्थित जापानी मंदिर जहां दुनिया भर के श्रद्धालुओं में श्रद्धा का भाव जगा रहा है तो मंदिर से सटे बना स्तूप शांति का संदेश कोने कोने में फैला रहा है. बता दें कि मंदिर कैंपस से सटे ही जापानी सोसाइटी ने शांति का मैसेज देने के लिए एक स्तूप स्थापित किया है. जहां पहुंचे श्रद्धालु अपने साथ शांति का संदेश भी लेकर वापस लौटते हैं.

मदद के बावजूद बदहाली


जहां जायका बनारस के विकास में मदद के लिये हाथों हाथ तैयार है वहीं काफी कुछ होने के बाद बदहाली के निशान मिट नहीं रहे. देखिये एक नजर में..

-जायका की ओर से मिली बड़ी धनराशि से काम तो शुरू हो गया लेकिन रिजल्ट अच्छा नहीं है.

-अभी तक लगभग तीन सौ करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं लेकिन काम को पूरी गति नहीं मिली है.

- वरुणापार एरिया के सीपेज को गंगा में गिरने से रोकने के लिए सीवर लाइन बिछा दी गयी है.

- ट्रीटमेंट प्लांट के लिए जमीन तय नहीं हो सकी. पहले संथवां में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनना था.

-जमीन नहीं मिल पाने की वजह से ट्रीटमेंट प्लांट टाइम लिमिट से काफी लेट हो चुका है.

-पुरानी सीवर लाइन की मरम्मत का काम भी पूरा नहीं, तीन में से एक पम्पिंग स्टेशन ही बना है.

- -कम्यूनिटी टायलेट काम्प्लेक्स भी अधर में, धोबी घाट नहीं बने और घाटों का रिनोवेशन भी शुरू नहीं.

-मणिकर्णिका, हरिश्चंद्र, अस्सी घाट जिनका रिनोवेशन जायका टीम ने किया, उसे पब्लिक ने बर्बाद कर डाला है.

समझौते से क्या होगा जब ये है हाल


-जापान के साथ बनारस को डेवलप करने का नया करार कितना कारगर होगा यह तो वक्त बताएगा.

- हर प्रोजेक्ट में केंद्र और राज्य सरकार के बीच सामंजस्य की कमी सबसे बड़ी अड़चन बनती है.

- विभिन्न विभागों के बीच तालमेल न होने से भी टेक्निकल इश्यूज खड़े होते हैं और प्रोजेक्ट लेट होता है.

- ज्यादातर सरकारी एजेंसियां ठेकेदारों से काम कराती हैं जिनका फोकस लूटने पर रहता है.

- जापानी एक्सप‌र्ट्स की गाइडलाइंस को भी कई बार इग्नोर किया जाता है जिससे मुश्किल आती है.

- लोकल लेवल पर पब्लिक को साथ न लेने से विरोध होता है, संथवा ट्रीटमेंट प्लांट इसका उदाहरण है.

क्योटो से मेल खाती है अपनी काशी

- दोनों ही हेरिटेज सिटीज में काफी कुछ हैं समानताएं, दोनों की ही गिनती होती है प्राचीन शहरों में

पीएम मोदी की ओर से काशी को जापान के क्योटो की तरह डवलप करने के एग्रीमेंट के बाद हो सकता है कि आप सोचें कि क्योटो की तर्ज पर डवलपमेंट क्यों. टोक्यो या नागासाकी की तरह डवलपमेंट क्यों नहीं. दरअसल जिस तरह बनारस पुराने और जीवंत शहरों में शुमार है. उसी तरह क्योटो भी पुराना और जीवंत शहर है. इसके अलावा भी क्योटो और अपनी काशी में काफी कुछ सेम है. ,

- काशी दुनिया की सबसे पुरानी और जीवंत नगरी के रुप में फेमस है.

- क्योटो भी जापान के इतिहास में सबसे पुराने और जीवंत शहरों में शामिल है.

- जिस तरह बनारस देश के धर्म और संस्कृति की राजधानी है वैसे ही क्योटो जापान की धर्म और संस्कृति की राजधानी का बड़ा केन्द्र है.

- बनारस जैसे गंगा, वरुणा और असि नदी से घिरा है वैसे ही क्योटो उजिगावा, कस्तूरगावा और कामोगावा नदियों के किनारे बसा है.

- काशी में भगवान बुद्ध ने अपना उपदेश दिया जबकि क्योटो में भगवान बुद्ध के काफी अनुयायी हैं.

- काशी विश्वनाथ मंदिर के तर्ज पर क्योटो का तोजी मंदिर जापानियों के लिये आस्था का बड़ा केंद्र है.

- व‌र्ल्ड हेरिटेज रिलीजियस प्लेसेज में शामिल तोजी टेम्पल साल भर में कुछ ही दिनों के लिए खुलता है.

- काशी विश्वनाथ मंदिर भी है द्वादश ज्योर्तिलिंगों में शामिल.

- क्योंकि क्योटो एकलौता ऐसा शहर जो जापान में सेकेंड वर्ड वार के बाद भी अपनी स्थिति में खड़ा रहा इस वजह से इस धार्मिक शहर के प्रति आस्था और मजबूत हुई.

- जैसे बनारस में हजारों की संख्या में शिवालय हैं वैसे ही क्योटो में ख्000 से ज्यादा धर्मस्थल हैं.

इसलिये भी स्पेशल है क्योटो

- ख्000 से ज्यादा धर्म स्थल हैं क्योटो में.

- क्म्00 बौद्ध मंदिर और ब्00 शिंतों धर्मशालाएं हैं यहां.

- ख्0 परसेंट धरोहरें, क्ब् सांस्कृति संपत्तियां हैं मौजूद.

- क्7 स्थान यूनेस्को की विश्व सांस्कृतिक धरोहरों में हैं शामिल.

- हाईस्पीड ट्रेनों समेत बेस्ट परिवहन सेवा है क्योटो में.

- पयर्टकों का आकर्षित करने के लिए इस सांस्कृतिक नगरी को किया गया है वैसे ही डेवलप.

- हर साल तीन करोड़ पर्यटक पहुंचते हैं क्योटो, इससे जापान की इकोनॉमी को होता है फायदा.

- इसी तर्ज पर बनारस को धार्मिक और सांस्कृति नगरी के तौर पर डेवलप कर पर्यटकों को लाने की है प्लैनिंग.

क्योंकि जापान समेत हर देश के लिए हैं खास

- बनारस और शहरों की तुलना में अलग है इसलिए यहां हर साल दुनिया भर से लाखों पर्यटक यहां आते हैं.

- शहर की आबादी है लगभग क्8 लाख से ज्यादा.

- पर्यटन विभाग के मुताबिक हर साल बनारस आने वाले पर्यटकों की संख्या होती है लगभग चार से पांच लाख.

- इनमे जापान के टूरिस्ट्स की संख्या भी होती है एक से डेढ़ लाख.

- जापान से आने वाले अधिकतर सैलानी सारनाथ बौद्ध दर्शन के लिए आते हैं.

- इसके अलावा थाईलैंड, श्रीलंका समेत कई दूसरे बौद्ध देशों से भी भारी संख्या में पर्यटक यहां आते हें

बहुत अच्छा होगा अगर ये होगा


- मोदी और जापान सरकार की ओर से काशी और क्योटो के समझौते को लेकर खुश हैं काशी में रहने वाले जापान के लोग काशी हर किसी को अपनाती है. यही वजह है कि यहां हर साल इस शहर की संस्कृति से प्रभावित होकर दर्जनों विदेशी यहीं के होकर रह जाते हैं. ऐसे ही कुछ जापानी नागरिक भी हैं जो आये तो थे काशी घूमने लेकिन फिर यही पर बस गए. इनमें से कुछ से हमने बात की और जानी उनकी राय जापान और भारत के इस समझौते पर.

आई ओर बस गई

ऐसी ही एक हैं सारनाथ में रह रही मिहो ईवाई जैन. मिहो बताती हैं कि ख्00ख् से पहले वह परिवार के साथ सारनाथ घूमने आई थी और यहां उनकी मुलाकात सारनाथ के अजय जैन से हुई. तब अजय स्टूडेंट थे. इन दोनों में बातचीत शुरू हुई और देखते ही देखते दोस्ती प्यार में बदल गई और मिहो ने अजय को अपना जीवन साथी बनाने के बाद जापान छोड़कर सारनाथ में ही रहना ठीक समझा और अब मिहो अजय के साथ यही पर पिछले क्ख् सालों से रह रही हैं. जापान के हिमेजी की रहने वाली मिहो बताती हैं कि ये समझौता निश्चित ही काशी की तकदीर बदलने का काम करेगा और काशी को वह सब मिलेगा, जिसकी वह हकदार है. वहीं पाण्डेयघाट पर ब्0 साल पहले आकर यही के शांति रंजन गंगोपाध्याय से शादी रचाकर यही के हो जाने वाली कोनिको का कहना है कि सरकार का ये कदम वेलकम करने वाला है क्योंकि यहां हर साल काफी जापानी टूरिस्ट आते हैं लेकिन उनको ये शहर अपना नहीं लगता. अब इस शहर की सूरत बदलेगी. इसके अलावा विश्वनाथ गली में जापान के कोबे से आकर बसी मेगूमी हिसादा का कहना है कि ख्00फ् में वह काशी और यहां के संजय से शादी करके बस गई. मेगूमी का कहना है कि काशी के असल रुप को बनाये रखते हुए क्योटो की तर्ज पर इसका विकास होना चाहिए.


सिद्धार्थ विमल
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बनारसी छोरों पर फिदा जापानी बालाएं

Vikas Bagi , वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब जापान गए होंगे तो उन्हें भी इसका इल्म नहीं रहा होगा कि जिस काशी का वह प्रतिनिधित्व करते हैं, वहां के छोरों पर जापानी बालाएं फिदा हैं। जापानी बालाएं आती हैं तो बनारस घूमने, लेकिन गंगा लहरों के बीच दिल हार जाती हैं। गंगा किनारे वाले अल्हड़ छोरों में अपना "प्यार" नजर आता है और उनके साथ जीने-मरने को अपना देश छोड़कर बनारस आ जाती हैं।

एडीएम सिटी का दफ्तर जहां विदेशी नागरिकों से संबंधित शादियां होती हैं, वहां का रिकॉर्ड बताता है 
कि जापान की युवतियां बनारस के लड़कों के साथ शादी करने के मामले में सबसे आगे हैं। हर साल कम से कम तीन से चार जापानी युवतियां बनारसी छोरों के साथ ब्याह रचाती हैं। बीते सात की ही बात करें तो अगस्त में शिवपुरवा के चंदन वर्मा और जापान के ओयामा शहर की जुनको ने एडीएम सिटी दफ्तर में कोर्ट मैरिज की है। पढ़ाई के दौरान दोनों के दिल मिले और फिर साथ जीने-मरने की कसमें खाते हुए चंदन और जुनको ने शादी कर ली।
इसी तरह एक कंपनी में सेल्स मैनेजर भूतेश्वर गली निवासी विक्की पॉल की आंखें कंपनी में ही काम करने वाली जापान के काना ससाकी से चार हो गईं। आज दोनों अपनी जिंदगी से बहुत खुश हैं। तीन साल पहले शास्त्रीय संगीत सीखने की चाह में जापान के नागानू सिटी से आईं 27 वर्षीय काउरू सितार सीखने के दौरान बढ़ई का काम करने वाले खालिसपुर निवासी इरशाद से मुलाकात हुई। उसकी साफगोई और प्यार भरी बातों ने काउरू का दिल जीत लिया। दोनों ने बीते वर्ष दिसंबर में एडीएम सिटी के कोर्ट में मैरिज कर ली। काउरू, रिनाको, कारो, इरिको, जुनको, कागोशिमा की नहीं, दर्जनों ऐसी जापानी बालाएं जो बनारस आकर रिश्तों में बंध गईं।
एडीएम सिटी के यहां मौजूद रिकॉर्ड बताते हैं कि वर्ष 2008 से 2014 के बीच सबसे अधिक जापानी युवतियां पांच वर्ष पूर्व 2009 में फिदा हुईं। पांच युवतियों ने यहां शादी की थी। 2010 में चार, 2011 में तीन, 2012 में दो, 2013 में दो और 2014 में अब तक तीन जापानी युवतियां बनारस को अपना ससुराल बना चुकी हैं।
दौलत नहीं, प्यार को तरजीह
जापान में बीते वर्ष नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन एंड सोशल सिक्योरिटी रिसर्च ने कुंवारी युवतियों से शादी के बाबत राय ली थी तब अधिकांश ने धन-दौलत के बजाय प्यार करने वाले जीवनसाथी को तरजीह दी थी। शायद यही वजह है बनारस के अल्हड़ छोरे जापानियों का दिल जीतने में आगे रहते हैं।


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भगवान श्री स्वामिनारायण का भब्य मंदिर - वाराणसी

भूतभावन भगवान भोलेनाथ की परमपावन मोक्षपुरी काशी नगरी में  मत्स्योदरी तीर्थ पर गायधाट महाँल की सीमा पर भगवान श्री स्वामिनारायण का मन्दिर अत्यन्त रमणीय एवं चित्ताकर्षक है । इस मन्दिर के पीछे दो सौ वर्ष का इतिहास है ।
पूरे गुजरात, सौराष्ट्र, महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश एवं देश -विदेश में फैले हुए श्री स्वामिनारायण संप्रदाय की गुजरात राज्य में  दो प्रमुख गद्दी है । एक वडताल में एवं दूसरी अहमदाबाद में है । काशी स्थित श्री स्वामिनारायण मन्दिर वडताल की श्री लक्ष्मी नारायण देव की गद्दी के अंतर्गत है ।

इस मन्दिर का इतिहास इस प्रकार है - बचपन में भगवान श्री स्वामिनारायण का नाम घनश्याम था , संप्रदाय के श्री हरि दिग्विजय ग्रंथ एवं परम्परागत कथा  के अनुसार भगवान श्री स्वामिनारायण जब दस वर्ष के थे तब पिता धर्मदेव के साथ काशी आये थे और यहाँ के मणिकार्डिका स्थित प्रसिद्ध गौमठ  में ठहरे थे । यहॉ विद्वानों की सभा हुई  जिसमे बालक घनश्याम की विदत्ता देख कर सभी विद्वान अत्यंत प्रभावित हुवे थे | तत्पश्चात भगवान श्री स्वामिनारायण ने अपने पिता के साथ काशी के प्रसिद्द  मत्स्योदरी तीर्थ एवं गायधाट पर स्नान  किया | इसी पुण्य स्मृति में यह दिब्य मंदिर बना है |
मन्दिर के  लिए यह जमीन तो लगभग १५० बर्ष पूर्व ही ली गयी थी लेकिन आज से करीब ६० वर्ष पूर्व  ध. धु . १००८  आचार्य श्री  आनंद  प्रसादजी की आज्ञा से गुजरात के महान तीर्थधाम वडताल के मुख्य कोठारी स . गु . ब्र  स्वामी श्री धर्म स्वरुप दास जी और स . गु . ब्र श्री मायतीतानन्द जी के अतिभारी परिश्रम से  एवं त्यागी संतो की सहायता से तथा हरिभक्ती के आर्थिक मदद से तथा कोठारी श्री खुशाल भाई ने (उक्त महानुभावों की ) सुचना के अनुसार, स्वयं स्रर्वप्रकार से निर्माण कार्य को संभाल कर  इस तीर्थराज काशी में श्री स्वामिनारायण के शिखर बंध मन्दिर का निर्माण  मिस्त्री वजेशंकर लक्ष्मी शंकर के द्वारा कराके उसमे श्री हरिकृष्णा महाराज ( श्री स्वामिनारायण भगवान) श्री लक्ष्मी नारायण देव , श्री काशी विश्वनाथ महादेव की प्राण प्रतिष्ठा  विक्रम संबत १९९८ के वैशाख सूदी (५) पंचमी और सोमवार एबं ता. २४-४-१९४२ के दिन कराई  गयी है ||

इस मंदिर का प्रमुख उद्देश्य भगवान श्री स्वामिनारायण की काशी यात्रा की पुण्य -स्मृति का संरक्षण करना , यात्रियों की सेवा करना एवं भगवत अनुष्ठार्थि व तीर्थवास कर सके तथा संत , विधार्थीयों की ब्यवस्था  द्वारा  सदविद्या  का प्रचार करना है || सदूविद्या - प्रवर्तन से बढ़ कर ज्यादा पुण्यप्रद कोई सत् कर्म नहीं है, अर्थात इससे बढकर भगवत्

प्रसन्नता का कोई साधन नहीं हैं और श्री स्वामिनारायण संप्रदाय का पुरे विश्व के कोने कोने तक प्रचार करने में जिन महानुभाव विद्वान संतो ने प्रमुख भूमिका निभाई उन सभी विद्वान संतो ने इस श्री स्वामिनारायण  मंदिर मन्दिर के जो अपनी मातृ संस्था है, उसका आश्रय लेकर सदविद्या की प्राप्ति की है शिल्प स्थापत्य एवं सुंदरता की दृस्टि से  श्री स्वामिनारायण मंदिर   काशी के  प्रमुख चार-पाँच मन्दिरों में से एक है । सरसरी निगाह से देखने पर उत्तरऱभिमुख यह मन्दिर सुन्दर  रथाकार प्रतीत होता है । मन्दिर के चारों ओर भगवान् के प्रमुख अवतारों शंकर-पार्वती , सरस्वती, गंगा, यमुना, यम और वरुण की प्रतिमा चित्त क्रो आकर्षित करती हैं और मन्दिर के पाँच अनुपम शिखरों पर सुवर्ण कलशा के साथ फहराती ध्वजाएँ मुमुक्षवो को मोक्ष प्रदान करने के लिए मानो आहवान कर रही हो |

निज मन्दिर
मुख्य मन्दिर, जिसको निज मन्दिर कहते है-तीन शिखरों वाला है  जिसमें पूर्व खण्ड में श्री विश्वनाथजी एबं पार्वतीजी अर्चास्वरूप से मूर्तिमान विराजमान होकर भक्तों को
प्रतिदिन इक्छित सुख देते हुवे दर्शन दे रहे है मध्य खण्ड में भगवान श्री स्वामि-नारायण एवं भगवान श्री लक्ष्मी नारायण  देव पंचधातुओँ से निर्मित प्रतिमा स्वरुप से विराजमान हो कर दरसनार्थियो के मन को आकर्षित करते है और अपूर्व शांति प्रदान कर के भक्त के तीन - ताप को हर लेते है मंदिर के पश्चिम खंड में भगवान की सुख शय्या रखी गयी है और श्री राधा कृष्णा एवं भगवान श्री स्वामिनारायणका सुन्दर चित्र और सुखशय्या है | मंदिर में प्रति दिन भगवान का पूजन एवं नूतन शृंगार होता है | मंदिर के उत्तर में प्रवेश द्वार्की सोपान श्रेणी के पास श्री हनुमान जी एवं श्री गणेश जी के मंदिर में शिव - सूर्यनारायण आदि विराजमान है  | सर्व देवो के प्रति आदर भावना  श्री स्वामिनारायण संप्रदाय की प्रमुख विसेसता  है |
मंदिर में संत छात्रावास भी है , मंदिर के आगंतुक यात्रियों के लिए आवास का सुन्दर प्रभन्ध  भी है  और आधुनिक ढंग से विशाल नूतन अतिथि भवन का निर्माण भी हुवा है

| वर्तमान समय में ये भगवान श्री स्वामिनारायण  का भब्य मंदिर सुन्दर कलाकृति का अनुपम नमूना कहा जाता है..

Address :

Shree Swaminarayan Mandir - Kashi

K 1/1, Machhodari Park
Gayghat - 221 001
Kashi, Banaras
Uttar Pradesh(UP)
Tel: +91 542 2435492
India










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मंदिर के फूल मालाओं से अब जैविक खाद

काशी के मंदिरों में प्रतिदिन चढ़ाई जाने वाली हजारों किलो फूल मालाएं अब गंगा में प्रदूषण का कारण नहीं बन रही हैं. भागीरथ सेवार्चन समिति ने मंदिरों के निर्माल्य से जैविक खाद बनाने की प्रक्रिया शुरु कर दी है

इस प्रक्रिया के तहत काशी के मंदिरों के निर्माल्य विर्सजित करने से रोकने और इस निर्माल्य को एकत्रित करने का काम समिति ने शहर के बाहर स्थित राजा तालाब के मेहदीगंज स्थित अपने जैविक खाद उत्पादन केंद्र में शुरु कर दिया है. तैयार खाद लागत मूल्य पर किसानों को उपलब्ध कराई जा रही है.

एक किलो खाद बनाने में समिति को 11.50 रुपये की लागत आ रही है जबकि इसे 12 रुपये प्रतिकिलो की दर से किसानों को उपलब्ध कराया जा रहा है. समिति के संरक्षक व काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत डॉ. कुलपति तिवारी के अनुसार नगर के सभी प्रमुख मंदिरों से निर्माल्य इकट्ठा कर उससे जैविक खाद बनाने की प्रक्रिया शुरु की गई है.

 उन्होंने बताया कि केंद्र में 63 टैंको में गोबर, माला, फूल, धतूरा और नीम की खली डालकर छोड़ उसे दिया जाता है. 60 दिनों के बाद खाद तैयार होने पर उसे 10 दिन तक सुखाया जाता है.

इस कोशिश से न केवल मंदिरों का निर्माल्य साफ हो रहा है, बल्कि गंगा भी साफ सुथरी रहेगी. अगर भारत के सभी मंदिरों में ये काम शुरू कर दिया जाए तो न केवल मंदिरों की सफाई हो सकेगी, बल्कि आस पास की छोटी नदियों या नालियां जाम नहीं होंगी. इतना ही नहीं पुराने फूलों के कारण होने वाले मच्छर भी नहीं होंगे.

जैविक खाद उत्पादन केंद्र के डॉ संजय गर्ग जैविक खाद को किसानों में लोकप्रिय कराने की कोशिश कर रहे हैं. उनका कहना है कि इसकी मदद से पैदा होने वाले फसल से शरीर स्वस्थ रहता है. वहीं संस्था के सचिव कैलाशनाथ बाजपेयी ने बताया कि गंगा को बचाने के लिए संस्था लोगों के बीच जागरूकता अभियान चलाएगी.


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काशी / वाराणसी की संगीत परम्परा (काशी संगीत समाज )_2

अनेक ब्राह्मण - परिवारों में विवाह के अवसर पर वरपक्ष कन्यापक्ष के विद्वानों के मध्य परस्पर विद्वत्तापूर्ण शास्रार्थ की परम्परा विद्यामान है. आज से कुछ वर्षों पूर्व तक काशी में पण्डित हीराचन्द्र भट्टाचार्या एवं पण्डित पूर्णचन्द्राचार्य के बाच व्याकरण आदि शास्रों के विषय में वाद - विवाद, शास्रार्थ की प्रौढ़ता एवं विद्वता दर्शनीय थी.
काशी प्राचीनकाल से ही संगीत नगरी के रुप में देश की सांस्कृतिक - राजधानी के गौरव को प्राप्त रही. यहाँ संगीतकला की उन्नति के लिए शिक्षालयों की व्यवस्थाका वर्णन बौद्धकालीन जातक कथाओं में वर्णित काशिराज ब्रह्मदत्त के शासनकाल में प्राप्त है. साहित्य, दर्शन, न्याय, व्याकरण आदि की भाँति ही संगीत - कला के प्रदर्शन हेतु प्रतियोगिता का आयोजन प्राप्त है, जिसमें यहाँ के प्रख्यात वीणावादक 'गुप्तिल' ने उज्जैन की अपने समकालीन वीणावादक 'मुसिल' को वीणावादन की प्रतियोगिता में पराजित किया था. तानसेन - परम्परा के अद्वितीय प्रतिनिधि रबाब वादक एवं सुर सिंगार वाद्य के अविष्कारक जाफर खाँ एवं संगीत सम्राट तानसेन के दामाद, ध्रुपद की डागुट एवं खण्डहार बाणी एवं वीणावादन में पारंगत, मिश्री सिंह की परम्परा में सुप्रसिद्ध वीणावादक निर्मलशाह के वीणा - रबाब के युगलबन्दी कार्यक्रम अनेक बार गुणग्राही नरेश काशिराज उदितनारायण सिंह के दरबार में आयोजित हुए, जिनमें दोनों ही विद्वानों की विद्वता से सारा दरबार प्रभावित हुआ. भारतीय संगीत के उत्थान के लिए पूर्ण समर्पित विद्वान श्री विष्णु नारायण भारतखण्डे एवं संगीत मनीषा श्री विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जैसे उत्कृष्ट विद्वानों से, काशी के पूर्धन्य विद्वानों में संगीत शास्र, गायकी, नायकी सभी विधाओं के सुयोग्य प्रतिनिधि श्री दरगाही मिश्र आदि के मध्य काशी के ठठेरी बाजार मुहल्ले में 'काशी संगीत - समाज' की सभी में संगीतविषयक अनेक प्रचलित - अप्रचलित रागों, तालों, बन्दिशों एवं शास्रों में वर्णित अनेक धारणाओं पर विशद विचार - विनिमय, तर्क वितर्क, खण्डन - मण्डन आदि का परस्पर आदान प्रदान किया गया. अनेक भ्रान्तियों के उन्मूलन हुए और इन विद्वानों की ज्ञानगरिमा से भातखण्डेजी, विष्णु दिगम्बरजी भी विशेष प्रभावित हुए.
इस प्रकार अध्ययन, अध्यापन, साधना, चिन्तन, मनन के साथ - साथ अपने - अपने विषय में शास्रार्थ - कला - निपुणता काशी के विद्वानों का मानस - मनोरंजन थी, जिसमें काशीस्थ - विद्वानों को अपूर्व निपुणता - सफलता प्राप्त थी. देश के अनेक प्रान्तों से काशी आ बसे विद्वानों का एकमात्र ध्येय शास्रों का घवेषणापूर्ण अधाययन ही थी. तमिल, तेलगु, कन्नड़, मलयालम, गुजराती, मराठी, मैथिली, बंगला, पंजाबी ही जिनकी मातृभाषा थी, उन विद्वानों ने भी संस्कृत में अध्ययन कर अपने ग्रन्थों का प्रणयन किया. संस्कृत भाषा इनके विचारों के प्रकाशन की वाणी और संस्कृत ही इनके जीवन की प्रक्रिया थी, जिसका निर्वाह यावज्जीवन इन विद्वानों ने किया. काशी के नागरिकों में शस्र विद्या, मल्लविद्या, शास्र - अध्ययन, काव्य, नाट्य, साहित्य, संगीत कला के प्रति सहज अभिरुचि, गौसेवा, दीन दु: खियों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण, देवभाषा, राष्ट्रभाषा, देश भक्ति, अन्याय के प्रति विरोध प्रकट करने की तत्परता एवं काशी की प्राचीन परम्परा एवं मर्यादा के लिए पूर्ण समर्पित भावना विशेषरुप से विद्यमान रही. मन, वाणी, कर्म में नैतिक शुद्धता की भावना एवं पूर्ण मर्यादा एवं परम संतोष के साथ प्रसन्नतापूर्वक जीने की कला शैली का आज भले ही अभाव दिखाई देतै है, किन्तु अतीत में इन मर्यादित गुणों के साथ ही काशई वासियों की अपनी विशिष्ट जीवन्त पहचान थी. पीतल, हाथी दाँत, लकड़ी, स्वर्ण, रजत आदि पर विशिष्ट, सुगन्धियों, इत्रों के निर्माण - विधिकी परिपक्कता, अनेक कलाओं में पूर्ण पटुता आदि गुणों के साथ सरलता, सौम्यता, वनम्रता, धार्मिक निष्ठा, स्वाभिमान के साथ पुण्य पावनी गंगा की धारा में नित्य स्नान, नटराज शिव, पराम्बा पार्वती के दर्शन पूजन का अभिलाषी, सभी कलाओं की विज्ञता में निमग्न, मर्यादित प्राचीन अमोद प्रमोद की कलात्म् परम्पराओं द्वारा सुरुचिसम्पन्न मानस मनोरंजन कर आनन्दमय जीवन जीना काशी की विशिष्ट पहचान रही है.
संगीत के प्रति विशेष आदर - प्रेम काशीवासियों में प्राचीनकाल से अविच्छिन्न चला आ रहा है, जिसके कारण लोक संगीत में प्रचलित अनेक शैलियाँ यहाँ के विद्वानों के सत्प्रयास से
शास्रीय संगीत की परिधि में न केवल प्रतिष्ठित हुई, अपितु उन्होंने अपना विशेष स्थान बनाया. अभि जात्य वर्ग तक सीमित शास्रीय संगीत, संगीत गोष्ठी एवं सम्मेलनों के माध्यम से सार्वजनिक रुप में समस्त काशी के संगीत प्रेमियों के उत्कृष्ट मनोरंजनार्थ गंगा की सायंकालीन धारा में बड़ी - बड़ी सुसज्जित, झाड़ - फानूशों के प्रकाश से आलोकित नाव पर होली के बाद पड़ने वाले प्रथम मंगलवार से आरम्भ प्रसिद्ध संगीत - मेला 'बुढ़वामंगल' की उत्कृष्ट कल्पना काशी की ही देन है, जिसमें धीरे - धीरे काशिराज के अतिरिक्त देश के अन्य नरेशों, संगीत प्रेमी रईसों, जमीनदारों, ताल्लुकेदारों ने भी बढ़ चढ़कर भाग लिया और सारी - सारी रात गंगा के तटों पर एवं नावों पर बैठकर देश के सुप्रसिद्ध कल विदों की संगीत साधना का तन्मयता से आनन्द प्राप्त किया. चैत मास में गुलाब की पंखुड़ियों से सुगन्धित, गुलाबी, परिधानों, आवरणों, गुलाब इत्र, गुलाब जल से सिंचित गुलाबी वातावरण में चैती गायन शैली की लोक परम्परा की परिधि में समेटने का श्रेय 'गुलाब बाड़ी समारोह' के माध्यम से साकार करने की मधुर कल्पना भी काशी ही की देन है, जो महाकवि कालिदासकालीन मदनोत्सव, हिण्डोलोतस्व, ऊदुमंगल आदि उत्सवों का नवीन रुप हैं.
इस प्रकार प्राचीनकालीन परम्पराओं से रससित अमोद - प्रमोद एवं मनोरंजन की विविध कलात्मक - वैशिष्टय विज्ञ काशी नगरी अपने मर्यादित आचरणों के साथ उच्च सुरुचिपूर्ण मनोरंजन में ही भावज्जीवन आनन्दमग्न जीवन जीने की आदी रही है, जिसके कारण उसे यहाँ की गरिमापूर्ण जीवनधारा से हटकर, अन्यत्र जीवन यापन के लिए जाना अत्यन्त कष्टमय प्रतीत होता है, यहाँ की सुखद, सन्तोषप्रद दैनन्दिन जीवन चर्या ही उसे पूर्ण सन्तुष्टि
प्रदान करती है। इस प्रकार की जीवनधारा को निरन्तर गतिमान बनाये रखने में राजा से लेकर जन सामान्य तक, विद्वानों से लेकर साधारण शिक्षित तक, धन श्रेष्ठी से लेकर अलमस्त, फक्कड़ त्रिकालदर्शी फकीर तक, काशीस्थ, विद्वानों के साथ ही काशई में बाहर से आये एवं आ बसे संगीत आदि कलाओं के मूरधन्य विद्वानों तक के काशी की प्राचीन गरिमा एवं सांस्कृतिक चेतना को गतिशीलता प्रदान कर अपना अमूल्य योगदान दिया है.
भारतवर्ष की प्रसिद्ध ऐतिहासिक नगरी काशी को अति प्राचीनकाल से ही देश की सांस्कृतिक केन्द्रस्थली होने का सौभाग्य मिला है. शिल्प हो अथवा कला, धर्म हो अथवा दर्शन, साहित्य हो अथवा संगीत - सभी क्षेत्रों में इस अप्रतिम नगरी की अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिसने सम्पूर्ण विश्व को अपने पाण्डित्य की गरिमा से विमुग्ध कर मार्गदर्शक होने का गौरव अर्जित किया है. संगीत के विगत तीन - चार सौ वर्षों के प्राप्त आधे - अधूरे अवशिष्ट इतिहास के अवलोकन से यह स्पष्ट विदित होता है कि सरस्वती की अजस्त नाद - धारा निरन्तर प्रवाहित होकर आज भी इस नगरी एवं यहाँ के संगीतज्ञों के वर्च को गौरव प्रदान करती चली आ रही है. संगीत - जगत के जाज्वल्यमान नक्षत्रों के रुप में इस नगरी के प्रसिद्ध - मनोहर मिश्र, शिवदास - प्रयाग मिश्र, ननकूलाल मिश्र, शिवा - पशुपति, मौजुद्दीन खाँ बड़े रामदास मिश्र, छोटे रामदास मिश्र, सरजूप्रसाद मिश्र, बीरु मिश्र, हरिशंकर मिश्र, दाऊजी मिश्र , प. श्री चन्द्र मिश्र, अनोखे लाल मिश्र, उस्ताद मुश्ताक अली खाँ, उस्ताद विसमिल्ला खाँ, प. रविशंकर, सिदाए देवी, गुदई महाराज, प. किश्न महाराज, गोपाल मिश्र बैजनाथ मिश्र, सिद्देश्वरी देवी, रसूलन बेगम, प. महादेव प्रसाद मिश्र, श्रीमती गिरिजा देवी सरीखे अनगिनत सशक्त हस्ताक्षर अपने जीवन काल में ही संगीत - जगत् की गौरव - गाथा बन चुके हैं.
काशी नगरी के जीवन काल में एक समय ऐसा भी था, जब घरानेदार संगीतज्ञों के गढ़ के रुप में काशी का सम्पूर्ण क्षेत्र चार भागों में विभाजित था. इसमें से एक घराना 'तेलियानाला घराना' (बीनकार, सितारपादक उस्ताद आशिक अली खाँ) दूसरा 'पियरी घराना' (प्रसिद्ध मनोहर मिश्र), तीसरा 'रामा पुरा मुहल्ले का घराना' शिवदास प्रयाग मिश्र (जो बाद में कबीर चौरा मुहल्ले में आ बसे) और चौथा सबसे विराट घराने के रुप में सम्पूर्ण 'कबीर चौरा मुहल्ला' जहाँ के पग - पग पर पूरी काशी के लब्ध - प्रतिष्ठ, विश्व - विश्रुत गुणी - गन्धर्वों § का दो तिहाई से अधिक समुदाय निवास करता था. इस मुहल्ले में गायन - क्षेत्र में श्री गजदीप मिश्र (अप्रतिम ठुमरी गायक, मौजुद्दीन खाँ के आदर्श एवं गुरु) जयकरण मिश्र (मूर्धन्य - विद्वान एवं बड़े रामदास मिश्र के श्वसूर) श्री ठाकुर प्रसाद मिश्र (पं. छोटे रामदास मिश्र के नाना), सारंगी वादन क्षेत्र में पं. शम्भूनाथ मिश्र, सुमेरु मिश्र, बिहारी मिश्र, बिरई मिश्र, बड़े गणेश मिश्र, शीतल मिश्र तबलावादन - क्षेत्र में पं. बनारस बाज एवं घराने के प्रवर्तक पं. रामसहायजी, एवं उनकी शिष्य - परम्परा में प्रताप महाराज, शरणजी, बैजूजी, सितार - क्षेत्र में विलक्षण लयभास्कर पं. ननकूलाल मिश्र, नृत्य - क्षेत्र में पं. शुकदेव महाराज आदि के घरानेदार विद्वानों के अतिरिक्त कुछ ऐसे भी चतुर्मुखी प्रतिभा सम्पन्न विद्वान थे, जो गायन, बीन,
सारंगी, सितार, तबला एवं नृत्य के समुचित पारंगत एवं मान्य विद्वान थे. ऐसे पारंगत विद्वानों में पियरी - घराना एवं श्री दरगाही मिश्र पूर्ण पटु मान्य विद्वान, माने जाते थे.
काशी का कबीरचौरा मुहल्ला सदियों से अब तक प्रमुख संगीतज्ञों का निर्विवाद मान्य गढ़ रहा है, जहाँ जन्म लेकर न जाने कितने विश्व विश्रुत विद्वानों ने इस मुहल्ले और नगर की ख्याति और गरिमा को विश्व में महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है. इस मुहल्ले के संगीतज्ञों का कोई ऐसा परिवार शायद ही हो जिसमें किसी - न - किसी समय किसी विश्व विख्यात कलाकार ने जन्म न लिया हो. सारांश यह कि हर परिवार की किसी न किसी महान संगीत - विभूति का अपने समय में संगीत - क्षेत्र में विशिष्ट एवं सहत्वपूर्ण स्थान अवश्य रहा और आज भी मान्य है. हर घरानों की अपनी निजी एवं मौलिक विशेषता रही. किसी घराने में ध्रुपद, धमार, होरी का वर्च था, तो कोई ख्याति शैली का कोई टप्पा - ठुमरी अंग में कोई सुरीलेपन - मिठास में कोई लयकारी प्रधान अंग में सुदक्ष, कोई स्वतंत्रवादन में अनुपम तो कोई - संगीत में बेजोड़ स्थान रखता था. कोई - कोई घराना ऐसा विशिष्टतम रहा, जो चारों पटकी गायकी एवं वादन शैली में पूर्ण पटु एवं पारंगत था. सभी घरानों ने अपनी मौलिकता एवं विशेषता से अपनी अलग पहचान बना रखी थी और सभी घरानेदार एक दूसरे की सौलिक विशेषताओं का हृदय से पूर्ण सम्मान करते थे तथा परस्पर प्रगाढ़ प्रेमबन्धन में बँधे थे. एक दूसरे की कला - साधना के प्रशंसक और आपसी ईर्ष्या - द्वेष से कोसों दूर धुरन्धर विद्वान् संगीतकाश के देदीप्यमान नक्षत्र के रुप में काशी नगरी की ख्याति में चार चाँद लग रहे थे. संगीत - जगत् में व्याप्त आज जैसी स्थिति उस समय नहीं थी.
काशी के घरानेदार संगीतज्ञों में एक ओर जहाँ ध्रुपद, धमार, होरी, ख्याल अंग के अनेक विशिष्ट कलाकार थे, वही कुछ अधकचरे संगीतज्ञों की टिप्पणी के अनुसार शुद्र गायन शैली की संज्ञा प्राप्त ठुमरी - टप्पा गायकी के ऐसे - ऐसे रससिद्ध कलाकार थे, जिनकी सूझबूझ पैनेपन और मधुकरी गायकी का सिक्का कलाकारों से लेकर जनसामान्य तक सभी पर जमा था. यही कारण है कि सभी प्रकार की गायन - वादन शैली की समुचित शिक्षा देने वाले विशिष्ट विद्वानों की जितनी विशाल संख्या इस नगरी को प्राप्त रही, उतनी संख्या में किसी अम्य नगर में सूर्धन्य विद्वान कलाकारों का मिलना दुष्कर रहा, जिसके कारण नगर का साधारण संगीत श्रोता भी गायन - वादन - नर्तन की प्रत्येक शैलियों के कार्यक्रमों को बराबर देखते - सुनते उनकी बारीकियों से परिचित रहा और अपने क्षेत्र के निष्णात, परिपक्क
कलाकार ही काशी में कार्यक्रम प्रस्तुत करके यश लूट पाते थे, अधकचरे संगीतज्ञ काशी में सार्वजनिक प्रदर्शन करने में संकोच का अनुभव करते थे. देश के अन्य स्थानों के कलाकारों के हृदय में काशी में सफल कार्यक्रम देकर जनता और विद्वानों की प्रशंसा पाने की तीव्र लालसा बनी रहती है. उनकी धारणा है कि जब तर काशई के संगीत प्रेमियों एवं विद्वानों द्वारी उनकी कला - साधना प्रशंसित नहीं होगी तब उनकी साधना मानो अधूरी से है.
काशी की जनता ने अपने नगर के प्रतिष्ठित कलाकारों के साथ ही अन्य नगरों के मान्य एवं लब्धप्रतिष्ठ अनेक कलाकारों की कला - साधना का पूर्ण तन्मयता से रसास्वादन करते हुए जितना आदर और अविस्मरणीय मधुर अनुभव उनके मानसपटल को आज भी झेकृत करता रहता है, जिससे वे कलाकार बार - बार काशी में अपना सफल कार्यक्रम देने के लिए उत्सुक रहते हैं. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में समाज की विषमताओं एवं अनेक विसंगतियों के बावजूद संगीत जगत् के अनेक गायक, वादक, नर्तक, यहाँ कार्यक्रम देने में गौरव का अनुभव करते है औ काशई नगरी को संगीत - जगत् के लिए कसौटी मानकर यहाँ की मिट्टी को विशेष सम्मान एवं प्यार देते हैं तथा बनारस के संगीत प्रमियों की बारीक पकड़ की प्रशंसा करते अघात नही
है. नगर में शास्रीय संगीत - समारोह के सुरुचि सम्पन्न पोषक वर्ग में जो उत्साह और चलचित्र संगीत अथवा किसी शुद्र स्तर के आयोजन पर दिखाई नहीं देता. शहर का सुरुचि सम्पन्न प्रतिष्ठित वर्ग ऐसे आयोजनों में सम्मिलित भी नहीं होता, केवल नई पीढ़ी की भीड़ इन आयोजनों में अधिक रुचि लेती है. शास्रीय संगीत के प्रति ऐसी दृढ़ आस्था, सद्भावना, सम्मान और प्रेम इस नगरी की सुरुचि - सम्पन्नता एवं गरिमा का परिचायक है.

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बनारस शिव से कभी मुक्त नही, जब से आये कैलाश न गये। बनारसी की मस्ती को लिखा नही जा सकता अनुभव होता है। अद्भूद है ये शहर जिन्दगी जीनेका तरीका कुछ ठहरा हुआ है पर सुख ठहराव में है द्रुतविलंबित में नही. मध्यम में है इसको जीनेवाला है यह नगर। नटराज यहां विश्वेश्वर के रुप में विराजते है इसलिये श्मशान पर भी मस्ती का आलम है। जनजन् शंकरवत् है। इस का अनुभव ही आनन्द है ये जान कर जीना बनारस का जीना है जीवन रस को बना के जीना है।
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काल हर !! कष्ट हर !! दुख हर !! दरिद्र हर !! हर हर महादेव !! ॐ नमः शिवाय.. वाह बनारस वाह !!