बनारस के अस्सी मोहल्ले के पप्पू की विश्व प्रसिद्ध चाय

बनारस में आकर जिसने यहाँ चाय नहीं पी, उसका जीवन बेकार



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वाराणसी के वैष्णव मन्दिर

भगवान विष्णु के काशी में स्थित मंदिरों की बात की जाये तो आदि केशव का मंदिर काफी प्राचीन एवं धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। कथा के अनुसार राजा दिवोदास से काशी प्राप्ति की इच्छा से गणेश जी सहित सभी देवताओं को भगवान भोलेनाथ ने काशी भेजा था, लेकिन काशी को प्राप्त करने की उनकी इच्छा पूरी न हो सकी। क्योंकि जो भी देवता काशी को दिवोदास से मुक्त कराने आये वे यहां की सुन्दरता देखकर वापस भगवान शिव के पास नहीं गये। अन्ततोगत्वा शिव जी ने इस कार्य के लिए भगवान विष्णु को काशी भेजा। भगवान शिव के निर्देश पर विष्णु जी लक्ष्मी सहित गरूड़ पर सवार होकर शिव जी की प्रदक्षिण कर उन्हें प्रणाम किया और मंदराचल पर्वत से काशी के लिए चल पड़े। काशी में उन्हें वरूणा गंगा संगम स्थल पर श्वेत द्वीप दिखाई दिया। वे अपने वाहन के साथ इसी स्थान पर उतर गये। संगम पर उन्होंने स्नान किया। जिससे यह तीर्थ विष्णु पादोदक के नाम से प्रसिद्ध हुआ। स्नान के बाद भगवान विष्णु ने भोलेनाथ का स्मरण कर काले रंग के पत्थर की अपनी त्रैलोक्य व्यापिनी मूर्ति आदि केशव की स्वयं स्थापना की। साथ ही कहा कि जो लोग अमृत स्वरूप अविमुक्त क्षेत्र (काशी ) में मेरे आदि केशव रूप का दर्शन-पूजन करते हैं, वे सब दुःखों से रहित होकर अंत में अमृत पद को प्राप्त करेंगे। तभी से इस स्थान का महत्व धार्मिक रूप से बढ़ गया। गंगा जी के किनारे आदि केशव के मंदिर का निर्माण गहड़वाल नरेश ने कराया था। जिसे 1194 में तोड़ दिया गया। मुस्लिम शासन के दौरान उपेक्षित इस मंदिर का पुनर्निर्माण 1807 में ग्वालियर के महाराजा सिन्धिया के दीवान मालो ने कराया। बाद में 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजी फौज ने इस मंदिर का अधिग्रहण कर लिया और पुजारी को बाहर कर दर्शन-पूजन पर प्रतिबंध लगा दिया। करीब 2 वर्ष बाद 1859 में पुजारी केशव भट्ट ने अंग्रेज कमिश्नर को प्रार्थना पत्र देकर मंदिर में पूजा पाठ शुरू करने की आज्ञा मांगी। तब जाकर मंदिर में पूजा शुरू हुई हालांकि आम दर्शनार्थियों के लिए प्रतिबंध यथावत था। इस मंदिर में निर्बाध रूप से दर्शन-पूजन 19वीं सदी से शुरू हुआ। पत्थरों से निर्मित इस मंदिर के मध्य गर्भगृह में आदि केशव की अलौकिक मूर्ति स्थापित है उन्हीं के बगल में केशवादित्य की मूर्ति भी है। बड़े से मंदिर परिसर में ही ज्ञानकेशव एवं हरिहरेश्वर महादेव का मंदिर है। साथ ही संगमेश्वर महादेव का भी छोटा सा मंदिर है। आदि केशव मंदिर में समय-समय पर भजन-कीर्तन एवं श्रृंगार के कार्यक्रम तो होते रहते हैं लेकिन बड़ा आयोजन वर्ष भर में 3 बार होता है। चैत्र महीने की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को बारूनी पर्व मनाया जाता है। इस दौरान मंदिर के आस-पास मेले का आयोजन होता है। काफी संख्या में भक्त वरूणा-गंगा संगम में स्नान कर आदि केशव का दर्शन करते हैं। इसके बाद भाद्र महीने के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को बामन द्वादशी मेला लगता है। जबकि पूष माह के कृष्ण पक्ष की प्रथमा तिथि को नगर परिक्रमा होती है। इस दौरान श्रद्धालु नगर भ्रमण करते हुए वरूणा-गंगा तीर्थ पर स्नान करने के बाद आदि केशव का दर्शन-पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। पंचक्रोशी यात्रा के दौरान भी यात्री आदि केशव पहुंचकर दर्शन-पूजन करते हैं। आदि केशव मंदिर दर्शनार्थियों के लिए प्रातःकाल 5 से दोपहर 12 तक एवं शाम को 3 रात साढ़े 9 बजे तक खुला रहता है। सुबह की आरती सूर्योदय के समय होती है एवं शाम की आरती रात साढ़े आठ बजे मन्त्रोच्चारण के बीच सम्पन्न होती है। इस मंदिर की खासियत यह है कि गर्भगृह के पास से मां गंगा की अविरल धारा बहती हुई दिखाई देती है। मंदिर बेहद शांत एवं रमणीय लगता है। कैंट स्टेशन से करीब आठ किलोमीटर दूर राजघाट के पास बसंता कालेज से होते हुए वरूणा-गंगा संगम पर यह बेहद सुन्दर मंदिर स्थित है।

बाला जी मन्दिर, पंचगंगा घाट
काशी और मंदिर एक दूसरे के पूरक ही नहीं बल्कि पहचान भी हैं। इस प्राचीन जीवंत शहर में कल्पनाओं से अधिक मंदिर विद्यमान हैं। जिनमें देवी-देवताओं की प्रतिमा श्रद्धालुओं को सम्मोहित कर लेती है। इस शहर के प्रसिद्ध घाट हों या गली-मोहल्ले अथवा विश्वविद्यालय यहां तक कि घरों में भी मंदिर स्थित हैं। इन मंदिरों से निकलने वाले मंत्रों, घण्ट-घड़ियालों की आवाज एवं माथे पर त्रिपुण्ड का लेपन किये लोग काशी की धार्मिकता का प्रमाण देते हैं। घाटों पर अनेकों मंदिर हैं। उन्हीं मंदिरों में से पंचगंगा घाट पर स्थित है बाला जी का मंदिर। घाट के बिल्कुल उपर स्थित इस मंदिर में बाला जी एवं उनकी पत्नी श्रीदेवी एवं भूदेवी की प्रतिमा स्थापित है। छोटे लेकिन महत्वपूर्ण बाला जी के इस मंदिर की सुंदरता बगल से ही प्रवाहमान माँ गंगा की अविरल धारा से और बढ़ जाती है। इस मंदिर के गर्भगृह को छोड़कर वर्तमान में बाकी का हिस्सा निर्माणाधीन है। मंदिर के इतिहास के बारे में पुजारी भालचंद्र गोकर्ण ने बताया कि कई सौ वर्ष पहले बाला जी की मूर्ति घाट किनारे ही निवास करने वाले एक गरीब ब्राह्णण को गंगा में मिली थी। उस ब्राह्णण ने मूर्ति को वहीं एक पेड़ के नीचे स्थापित कर दिया। सन 1857 के पहले पेशवाओं ने इस मूर्ति की स्थापना मंदिर में की।

बाला जी के दर्शन-पूजन के माहात्म्य के बारे में बताया जाता है कि इनके दर्शन से व्यक्ति के सभी पाप कट जाते हैं और धन सम्पदा की प्राप्ति होती है। इस मंदिर में शारदीय नवरात्र में वृहद स्तर पर कार्यक्रम का आयोजन होता है। इस दौरान नौ दिनों तक बाला जी का अलग-अलग तरीके से श्रृंगार होता है। जिनके दर्शन के लिए काफी संख्या में दर्शनार्थी मंदिर में पहुंचते हैं। वहीं, कार्तिक पूर्णिमा के दिन इनका विषेश रूप से मख्खन से श्रृंगार किया जाता है। यह अनूठा श्रृंगार बालाजी मंदिर का प्रतीक बन गया है। मंदिर आम दर्शनार्थियों के लिए सुबह 6 बजे से 10 बजे तक एवं सायं साढ़े 5 बजे से साढ़े 7 बजे तक खुला रहता है। मंदिर में सुबह की आरती साढ़े 6 बजे एवं शयन आरती सायं 7 बजे होती है।

बिन्दु माधव मंदिर
हर कंकड़ में शिव के वास वाली इस मस्तमौला नगरी में भगवान विष्णु के भी मंदिरों की एक लम्बी श्रृंखला है। पौराणिक मान्याताओं के अनुसार काशी में स्थित मंदिरों में भगवान विष्णु की प्रतिमाओं में वे विराजमान रहते हैं। यहां स्थित विष्णु मंदिरों में बिन्दु माधव का मंदिर काफी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि बिन्दु माधव के दर्शन-पूजन से सारे पाप कट जाते हैं और भक्त को तीनों लोकों का सुख प्राप्त होता है। कथा के अनुसार भगवान शिव के कहने पर प्रभु विष्णु मन्दराचल पर्वत से काशी विशेष कार्य को संपादित करने आये। उस समय यहां के राजा दिवोदास थे। भगवान विष्णु अपने कार्य को पूरा कर काशी की सुन्दरता देखकर मोहित हो गये। उन्हें गंगा जी का पंचनदी तीर्थ (पंचगंगा घाट) बहुत भाया। इसी तीर्थ पर ऋषि अग्नि बिन्दु रहते थे। उन्होंने भगवान को अपने सम्मुख देखा तो उनकी स्तुति करने लगे। अग्नि बिन्दु की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उनसे कोई वरदान मांगने को कहा। इस पर अग्नि बिन्दु ने बड़े ही निर्मल भाव से भगवान विष्णु से उनके काशी में रहने का वरदान मांगा। इस पर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान देते हुए पंचगंगा घाट पर विराजमान हो गये जो बिन्दु माधव के नाम से प्रसिद्ध हुए। पूर्व में इनका प्रसिद्ध मंदिर वर्तमान में पंचगंगा घाट पर स्थित आलमगीर की मस्जिद की जगह था। भारत में जब मुस्लिम शासन का प्रभाव था तो उस दौरान इस मंदिर को भी ध्वस्त कर दिया गया। बाद में श्रद्धालुओं ने इनका मंदिर पंचगंगा घाट के पास गली में बनवाकर मूर्ति की स्थापना की। मान्यता के अनुसार बिन्दू माधव के दर्शन से सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं और सुख-समृद्धि बढ़ती है। यदि पंचगंगा तीर्थ पर स्नान करके बिन्दु माधव का दर्शन किया जाये तो और ज्यादा पुण्य मिलता है। इस तीर्थ पर स्नान का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि कहा जाता है कि कार्तिक महीने में प्रतिदिन विश्वेश्वर महादेव यहां स्नान करने आते हैं। इसी महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी को बिन्दु माधव का आकर्षक श्रृंगार किया जाता है। मंदिर में इस दौरान उत्सव जैसा माहौल रहता है। इस दौरान श्रद्धालु मंदिर में पहुंचकर दर्शन-पूजन कर आशीर्वाद लेते हैं। बिन्दु माधव का मंदिर पंचगंगा घाट पर के 22/37 में स्थित है। कैंट रेलवे स्टेशन से यह मंदिर करीब 8 किलोमीटर दूर है। आटो द्वारा मैदागिन चौराहे पर पहुंचकर वहां से पैदल ही गलियों में से बिन्दू माधव के मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। यह मंदिर प्रातःकाल 4 से रात 8 बजे तक दर्शनार्थियों के लिए खुला रहता है। मंगला आरती प्रातः 4 बजे श्रृंगार आरती सुबह 8 बजे एवं शयन आरती रात 8 मन्त्रोच्चारण के बीच सम्पन्न होता है।

गोपाल मंदिर
वाराणसी यानी मंदिरों का शहर। विश्व के इस सबसे पुराने शहर की खासियत यह रही है कि यहां कदम-कदम पर मंदिर मिल जायेंगे। इन मंदिरों से जुड़ा हुआ है बेहतरीन इतिहास और लोगों की असीम आस्था। बात जब काशी की होती है तो सबसे पहले शिवमंदिर ही चर्चा में आते हैं। लेकिन यहां का गोपाल मंदिर भी अनुपम एंव अद्वितीय है। बनारस के हृदय अर्थात पक्के मोहाल में यह भव्य मंदिर स्थित है। इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां शुद्धता का विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है। आलम यह है कि गोपाल जी को लगने वाला भोग भी मंदिर परिसर में ही तैयार किया जाता है जिसके लिए मंदिर में ही गोशाला है। साथ ही जिस वस्त्र को पहन कर एक बार भगवान की सेवा हो जाती है दोबारा उस वस्त्र को पहनकर सेवा नहीं की जाती। भगवान की मूर्ति को स्पर्श करने का अधिकार केवल दो व्यक्तियों को ही है। वही लोग भगवान का श्रृंगार एवं आरती करते हैं। इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण दो रूपों में स्थापित हैं। एक रूप में गोपाल जी एवं दूसरे में मुकुन्द लाल जी की मनमोहक मूर्ति मंदिर में स्थापित है। कहा जाता है कि गोपाल जी एवं राधिका की जो मूर्ति मंदिर में स्थापित है उसकी सेवा बहुत पहले उदयपुर के राणावंश की लाढबाई नाम की महिला करती थी। उस महिला से यह प्रतिमा श्रीमद्वल्लभाचार्य के चतुर्थ पौत्र गोस्वामी श्री गोकुलनाथ ने प्राप्त कर सेवा शुरू की और इनके वंशज आज भी सेवा में लगे हुए हैं। गोपाल जी की अलौकिक मूर्ति को काशी गोलोकवासी गोस्वामी जीवनलाल जी महराज लाये और 1787 0 में स्थापना की। जबकि वर्तमान में जो मंदिर का स्वरूप है उसका निर्माण 1834 0 में गोस्वामी जीवन ने ही कराया था। इसी वजह से इस मंदिर को जीवनलाल जी की हवेली के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के बगल में ही मुकुन्द लाल जी का भी मंदिर है जिसका निर्माण 1898 में किया गया। इस मंदिर में मुकुन्द लाल की बालरूप की मनोहारी प्रतिमा स्थापित है। पक्के मोहाल जैसे अति सकरे क्षेत्र में यह विशाल एवं भव्य मंदिर बेहद खूबसूरत लगता है। मंदिर के ठीक पीछे ही इसका सुन्दर एवं हरा-भरा उद्यान है। जिसके एक कोने पर बैठकर गोस्वामी तुलसीदास जी ने विनयपत्रिका की रचना की थी। इस उद्यान की महत्ता इसलिए भी बढ़ जाती है कि यहां महात्मा नंददास ने साधना किया था। प्रत्येक वर्ष होली से पहले इस उद्यान में गोपाल जी का होलीउत्सव मनाया जाता है। इस दौरान उद्यान को बेहद आकर्षक ढंग से सजाकर फूल एवं गुलाल के साथ होली खेली जाती है। साथ ही भजन-कीर्तन एवं होली गीत गाये जाते ह़ैं। मंदिर परिसर में प्रचीन सात कुंए भी हैं जिसे पहले सप्तकुण्डी कहा जाता था। इस मंदिर में दर्शन का समय बेहद छोटा एवं सीमित है। प्रातःकाल के दर्शन में मंगला, श्रृंगार, पालना एवं राजभोग का दर्शन होता है। वहीं, शाम को उत्थापन, भोग, आरती एवं शयन आरती के दौरान मंदिर का पट खुलता है। पट खुलने के लगभग 15 मिनट के भीतर ही उसे बंद भी कर दिया जाता है। इस मंदिर में मुरलीधर पुस्तकालय एवं वाचनालय भी है जहां बैठकर विद्वतजन अध्ययन करते हैं। मंदिर के मुख्य महंत श्री श्याम मनोहर जी हैं। मंदिर में कृष्ण जन्माष्टमी धूमधाम से मनायी जाती है साथ ही भगवान का अन्नकूट एवं श्रृंगार होता है। कैंट स्टेशन से करीब पाँच् किलोमीटर दूर यह मंदिर चौखम्भा क्षेत्र में स्थित है। चौक थाने के सामने ठठेरी बाजार से होते हुए भारतेन्दु भवन के आगे जाने पर यह मंदिर स्थित है।


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विमल कुण्ड

<<--मुख्य पेज "वाराणसी एक परिचय " 

पिशाचमोचन पर पिशाचेश्वर का मंदिर है। उनके दक्षिण में पित्रीश्वर पितरकुण्डा (पितृकुण्ड) के समीप हैं वहीं पर छागलेश्वर भी हैं। कर्पदीश्वर तथा विमलेश्वर का मंदिर पिशाचमोचन पर है। विमल कुण्ड पिशाचमोचन तालाब के नाम से प्रसिद्ध है। हेरम्ब विनायक पिचाशमोचन के समीप बाल्मीकि टीले पर हैं और उनके निकट ही बाल्मीकीश्वर है जो बाल्मीकि टीले पर है। पिशाचमोचन के निकट ही पंचास्य विनायक है और समीप ही पिंगलेश्वर का मंदिर है। पितृकुण्ड के समीप 70-75 मीटर से अधिक की दूरी पर मातृकुण्ड है। आज भी मातृ गया होती है यह तीर्थ सिद्धपुर (सौराष्ट्र) में हैं जहाँ कपिल ने अपनी माता की सांख्य का उपदेश दिया था।
 

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. कुंड व तालाब (हिंदी) काशी कथा।


 

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मातृ कुण्ड


<<--मुख्य पेज "वाराणसी एक परिचय " 

मातृ कुण्ड उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी नगर में स्थित है। मातृ कुण्ड लल्लापुरा में पितृकुण्ड के पहले स्थित था। इस कुण्ड को क्षेत्रीय लोगों ने कूड़ा डालकर धीरे-धीरे पाट दिया। बाद में कुण्ड की खुदाई करने पर मातृ देवी की मूर्ति मिली, जिसे कुण्ड के ऊपर मंदिर बनवाकर स्थापित कर दिया गया। पहले तीर्थ यात्री यहां आकर मातृ देवी का पूजन-अर्चन करते थे फिर तर्पण करते थे। इस कुण्ड को बचाये रखने के लिए यहां हर वर्ष रामलीला का आयोजन किया जाता है

 टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. कुंड व तालाब (हिंदी) काशी कथा।

 

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!! शिवनामावल्यष्टकम् !!

!! शिवनामावल्यष्टकम् !!
हे चन्द्रचूड मदनान्तक शूलपाणे
स्थाणो गिरिश गिरिजेश महेश शम्भो ।
भूतेश भीतभयसूदन मामनाथं
संसारदुःखगहनाज्जगदीश रक्ष ।। 1 ।।
हे पार्वतीहृदयवल्लभ चन्द्रमौले
भूताधिप प्रमथनाथ गिरीशजाप ।
हे वामदेव भव रुद्र पिनाकपाणे
संसारदुःखगहनाज्जगदीश रक्ष ।। 2 ।।
हे नीलकण्ठ वृषभध्वज पञ्चवक्त्र
लोकेश शेषवलयं प्रमथेश शर्व ।
हे धूर्जटे पशुपते गिरिजापते मां
संसारदुःखगहनाज्जगदीश रक्ष ।। 3 ।।
हे विश्वनाथ शिव शंकर देवदेव
गंगाधर प्रमथनायक नन्दिकेश ।
बाणेश्वरान्धकरिपो हर लोकनाथ
संसारदुःखगहनाज्जगदीश रक्ष ।। 4 ।।
वाराणसीपुरपते मणिकर्णिकेश
वीरेश दक्षमखकाल विभो गणेश ।
सर्वज्ञ सर्वहृदयैकनिवास नाथ
संसारदुःखगहनाज्जगदीश रक्ष ।। 5 ।।
श्रीमन् महेश्वर कृपामय हे दयालो
हे व्योमकेश शितिकण्ठ गणाधिनाथ ।
भस्मांगरागनृकपालकलापमाल
संसारदुःखगहनाज्जदीश रक्ष ।। 6 ।।
कैलासशैलविनिवास वृषाकपे हे
मृत्युञ्जय त्रिनयन त्रिजगन्निवास ।
नारायणप्रिय मदापह शक्तिनाथ
संसारदुःखगहनाज्जदीश रक्ष ।। 7 ।।
विश्वेश विश्वभवनाशक विश्वरुप
विश्वात्मक त्रिभुवनैकगुणाभिवेश ।
हे विश्वबन्धु करुणामय दीनबन्धो
संसारदुःखगहनाज्जगदीश रक्ष ।।
गौरीविलासभवनाय महेश्वराय
पञ्चाननाय शरणागतरक्षकाय ।
शर्वाय सर्वजगतामधिपाय तस्मै
दारिद्रयदुःखदहनाय नमः शिवाय ।। 9 ।।

।। इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं शिवनामावल्यष्टकं सम्पूर्णम् ।।





Gopal Krishna Shukla
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बनारसी नास्ता

बनारसी नास्ता.. असली बनारसी मस्ती गुरु 


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अघोर साधना का केन्द्र क्रीं-कुण्ड

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यह शिवाला मुहल्ले में स्थित है तथा इसका मुख्य द्वार रवीन्द्रपुरी कालोनी मार्ग की तरफ है। यह तपोभूमि अधोरपीठ बाबा कीनाराम स्थल के नाम से प्रसिद्ध है।
अनेक प्राचीन ग्रन्थों में भी इसकी विशेषताओं का उल्लेख मिलता है। क्रीं कुण्ड केदार खण्ड में स्थित है जिसे धार्मिक दृष्टि से काफी पवित्र क्षेत्र माना जाता है।
इस खण्ड के दक्षिणी भाग में विशाल बेल-वन होने के कारण बेलवरिया के नाम से भी इसे जाना जाता था। बढ़ती जनसंख्या के कारण बेल के वन कटते गये और उनकी जगह ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएं ले ली हैं। यहाँ माँ हिंगलाज के नाम पर रमणीक ताल स्थित था, जिसका नाम था हिग्बा ताल। इसके मध्य में माँ हिंगलाज के बीच मंत्र पर आधारित क्रीं कुण्ड है। ये सभी नाम प्राचीन भू-अभिलेखों में आज भी उपलब्ध है। इसी के मध्य स्थित है अघोरपीठ बाबा कीनाराम स्थल, जिसके दक्षिण-पश्चिमी कोण पर स्थित है माता रेणुका का मंदिर। रेणुका ऋषि यमदाग्नी की धर्मपत्नी थीं।
इस अघोर तपस्थली के मुख्य द्वार पर स्थित दोनों खम्भों पर एक के ऊपर एक स्थित तीन मुण्ड अभेद के प्रतीक हैं। जो यह दर्शाते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश में भेद नहीं है। ये तीनों एक ही हैं और कार्य के अनुसार तीन स्वरूप में दर्शाये जाते हैं। क्रीं कुण्ड भगवान सदाशिव का कल्याणकारी स्वरूप है। जनमानस में यह अवधारणा प्रचलित है कि किसी भी प्रकार की विपत्ति व आपदा से हतोत्साहित व्यक्ति रविवार व मंगलवार को पाँच दिन क्रीं कुण्ड में स्नान करे या मुँह-हाथ धोने के बाद आचमन करे, तो उसके कष्ट का निवारण हो जायेगा। इस लोक अवधारणा के चलते यहाँ के प्रति रविवार व मंगलवार को श्रद्धालुओं की काफी भीड़ होती है। जो व्यक्ति पहली बार स्नान करते हैं, वे अपना वस्त्र जिसे पहनकर आये होते हैं, स्नान करने के बाद वहीं छोड़ देते हैं और दूसरा वस्त्र पहनकर वापस जाते हैं। वे बारादरी में बैठे व्यक्ति को थोड़ा सा चावल-दाल अर्पित कर विभूति ग्रहण करते हैं। उसके बाद वे बाबा कीनाराम की समाधि की तीन बार परिक्रमा करते हैं। श्रद्धालुओं द्वारा छोड़े गये वस्त्र को बाद में गरीबों को दे दिया जाता है।
कीनाराम स्थल पर जलने वाली धुनिकी विभूति ही यहाँ का प्रसाद है। जनश्रुतियों के अनुसार यह धुनी कभी बुझती नहीं है। इस कक्ष के अन्दर गुरू का आसन है। इसके दक्षिण ओर विशाल व भव्य समाधि से लगा ग्यारह पीठाधीशों की समाधि श्रृंखला एकादश रूद्र का प्रतीक है। इस विशाल समाधि के अन्दर गुफा में माँ हिंगलाज यन्त्रवत स्थित हैं, जिनके बगल में अघोराचार्य बाबा कीनारम का पार्थिव शरीर स्थापित है। इसके ऊपर स्थित पांचवा मुख जो शिव शक्ति का प्रतीक है। यहाँ तक पहुंचने का एक मात्र अवलम्ब है गुरू। वहाँ जाने वाले संकरे मार्ग के एक ओर आदि गुरूदत्तात्रेयस्वरूपी बाबा कालूराम की समाधि और दूसरी ओर बीसवीं सदी के उन्ही के स्वरूप बाबा राजेश्वर राम की श्वेत मूर्ति है।
बाबा कीनाराम की चार वैष्णवी व चार अघोरी कृति की गद्दी स्थापित की थी, जिसमें यह स्थल सर्वश्रेष्ठ है। अधोर गद्दी में अन्य तीन रामगढ़ (चन्दौली), देवन (गाजीपुर), हरिहरपुर (चन्दवक) तथा नायकडीह (गाजीपुर) में स्थापित है। अघोर का अर्थ है अनघोर अर्थात् जो घोर न हो, कठिन या जटिल न हो। अर्थात् अघोर वह है, जो अत्यन्त सरल, सुगम्य, मधुर व सुपाच्य है। सभी के लिये सहज योग है। यह किसी धर्म, परम्परा, सम्प्रदाय या पन्थ तक ही सीमित नहीं है। वास्तव में यह एक स्थिति, अवस्था व मानसिक स्तर है।
दरअसल अघोर पंथ सभी के अन्दर से गुजरने वाला सरल पंथ है। यह न केवल हिन्दू में निहित है और न ही मुसलमान, ईसाई, यहूदी आदि मतावलम्बियों में। इसे कोई भी सीमा रेखा बांध नहीं सकती है। यह न केवल शैव में और न ही इसे शाक्त, वैष्णवी या अघोरी सीमा में ही आबद्ध किया जा सकता है। यह शाश्वत सत्य का परिचायक है। अघोर साधना में मांस व मदिरा का सेवन तथा शव साधना कोई आवश्यक नहीं है। यह साधना की दिशा में एक पड़ाव है, लेकिन बहुत से साधक इसी को अन्तिम चरण मानकर सिर्फ मांस व मदिरा के चक्कर में ही पड़ जाते हैं।
बाबा कीनाराम ने मुगलकाल में समाज में व्याप्त अनेक भ्रान्तियों को अपनी साधना के बल पर दूर करने की कोशिश की और उसमें उन्हें काफी सफलता भी मिली। उनसे सम्बन्धित अनेक लोक कथाएं समाज में प्रचलित हैं। जनता पर उनका व्यापक असर था, यही कारण है कि आज भी लोग श्रद्धा से उनकी याद करते हैं और क्रीं कुण्ड में स्नान कर अपने दुःखों से निजात पाने हेतु प्रार्थना करते हैं। बाबा कीनाराम ने अघोर साधना पद्धति को एक नया आयाम प्रदान किया बाद में आधुनिक युग में भगवान राम ने इस साधना पद्धति को सीधे समाज सुधार से जोड़ दिया और सर्वेश्वरी समूह की स्थापना कर उसको एक नया स्वरूप प्रदान किया। स्थान या सामग्री का कोई विशेष महत्व नहीं है अगर महत्व है, तो चेतना व विवेक का। कुर्बानी की प्रथा पर भी अब प्रतिबन्ध लगा दिया गया है।
क्रीं कुण्ड में एक पुराना इमली का का पेड़ है, जिस पर दर्जनों बड़े-बड़े चमगादड़ हैं। बसन्त ऋतु में पतझड़ के समय इनकी संख्या और बढ़ जाती है। परिसर में स्थित कुछ अन्य पेड़ों पर भी ये चमगादड़ रहते हैं, जिनका वजन दो से तीन किलो से भी अधिक होगा। यह आश्चर्य की बात है कि आस-पास के क्षेत्र में अनेक पेड़ हैं लेकिन वहाँ इतने बड़े-बड़े चमगादड़ नहीं रहते हैं, जबकि क्रीं कुण्ड में स्थित वृक्षों पर वे रहते हैं। बाबा कीनाराम पीठ के 11 वें पीठाधीश्वर बाबा सिद्धार्थ गौतम हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. कुंड व तालाब (हिंदी) काशी कथा।

 

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बनारस शिव से कभी मुक्त नही, जब से आये कैलाश न गये। बनारसी की मस्ती को लिखा नही जा सकता अनुभव होता है। अद्भूद है ये शहर जिन्दगी जीनेका तरीका कुछ ठहरा हुआ है पर सुख ठहराव में है द्रुतविलंबित में नही. मध्यम में है इसको जीनेवाला है यह नगर। नटराज यहां विश्वेश्वर के रुप में विराजते है इसलिये श्मशान पर भी मस्ती का आलम है। जनजन् शंकरवत् है। इस का अनुभव ही आनन्द है ये जान कर जीना बनारस का जीना है जीवन रस को बना के जीना है।
Copyright © 2014 बनारसी मस्ती के बनारस वाले Designed by बनारसी मस्ती के बनारस वाले
Converted to blogger by बनारसी राजू ;)
काल हर !! कष्ट हर !! दुख हर !! दरिद्र हर !! हर हर महादेव !! ॐ नमः शिवाय.. वाह बनारस वाह !!