बनारसीपन यानी मौज-मस्ती का दूसरा नाम

बनारसीपन यानी मौज-मस्ती का दूसरा नाम। शायद ही वर्तमान समय की इस दौड़भाग भरी जिंदगी में कहीं लोगों को मौजमस्ती के लिए भरपूर फुर्सत मिलती हो लेकिन काशीवासी इस मामले में धनी हैं। तमाम काम के बावजूद लोग अपने और दूसरों के लिए समय निकाल ही लेते हैं। वहीं, काम के दौरान माहौल को हल्का फुल्का बनाने की कला बनारसियों का स्वाभाविक गुण है। महादेव की नगरी में बिना भांग खाये भी लोगों के बातचीत का लहजा अल्हड़पन लिए रहता है। एक बात जो बनारसियों के मौजमस्ती का ट्रेडमार्क बन गयी है वह है गंभीर से गंभीर मसले पर भी मुंह में पान घुलाते हुए बात करना। इस दौरान यदि मुंह से पान की लाल छीटें सफेद कुर्ते या शर्ट पर गिर जाये तो बनारसी स्टाइल में चार चांद लग जाता है।
भले ही कहा गया हो कि सबहे बनारस और शामें अवध लेकिन वास्तविकता तो यह है कि बनारस की सुबह जितनी खूबसूरत होती है उससे भी अनोखी, अदभुत और चकाचौंध करने वाली यहां की मदमस्त शाम है। काशी में जैसे-जैसे सूरज ढलता है शाम और हसीन और रंगीन होती जाती है। जीवनदायिनी मां गंगा के सुमधुर कल-कल करते जल और उसपर पड़ता घाटों पर लगे हाईमास्ट लाइटों की परछाईं पानी में पड़ती है तो घाट पर बैठे लोग उत्साहित हो जाते हैं। जिसका लुत्फ उठाने के लिए बनारसी समय निकाल ही लेता है। मौजमस्ती का आलम बानरस में इस कदर रहता है कि चाय की दुकानों पर एक पुरवे गरम चाय को पीते-पीते घंटों गुजार देना बनारसी मौज मस्ती का जीवंत उदाहरण है। वहीं, चाय वाला भी गप लड़ा रहे लोगों को दुकान से जाने के लिए नहीं कहता है बल्कि गप्पेबाजी में खुद भी सहभागिता कर माहौल का आनंद उठाता है। बनारसीपन के इस खास अंदाज और देशीपन से ही वह कहीं रहे आसानी से पहचाना जा सकता है। बातचीत में 'गुरू' 'मालिक' 'बाबा' 'महराज' जैसे शब्दों का प्रयोग आम बनारसी करता ही है। बाइक पर चलते हुए सकरी गलियों के भीड़भाड़ के बीच जाते हुए पीछे से सांड़ को छेड़ना बनारसियों के आदत में शुमार है। कहा जाता है कि बनारसी प्रतिकूल हालात में भी सामान्य रहते हैं। यहां शोक नहीं उल्लास है। जन्म से लेकर मृत्यु तक काशी में संगीत बजता है। यही तो है काशी जहां बाहर से आने वाले का मन बिना दिखावटी आकर्षण के भी रम जाता है। बनारस की मौज मस्ती को खास दायरे में बांधा नहीं जा सकता है क्योंकि यहां राह चलते भी मौज मस्ती है। फिर भी कुछ प्रमुख तरीके से लोग मौज मस्ती करते हैं।

1- साफा पानी- काशी में साफा पानी ऐसी क्रिया है जो हर आम बनारसी करता है। साफा पानी के तहत स्नान, व्यायाम, कपड़ा सफाई होती है। यानी दैनिक काम को भी बनारसी मौजमस्ती से जोड़कर करता है। जिससे काम बोझ नहीं बल्कि आनंद का बोध कराते हैं।
2- रोगन पानी- यह शब्द भी बनारसी मौजमस्ती का प्रतीक है। रोगन पानी का मतलब है तेल मालिश, श्रृंगार इ़त्र लगाना और घूमने निकल जाना है।
3- माल पानी- माल पानी यानी धन कमाना या कमाई करना है। बनारसी धन कमाने को भी हल्के-फुल्के अंदाज में मालपानी का नाम देता है।
4- माझा पानी- बनारसी किसी बात को घुमा फिरा कर कहने की बजाय अपनी बात बेबाकी और आसानी से कहता है।
5- मौज पानी- भांग, ठंडई, पान, रबड़ी, मलाई, कचौड़ी जलेबी, लस्सी का सेवन बनारसी मौज मस्ती का अभिन्न अंग है।
6- माचा पानी- बात-बात पर अपनी शेखी बघारना एवं दूसरों को मूर्ख बनाना बनारसियों की खास पहचान है।
7- रंग पानी- यह शब्द भी मौज मस्ती से ही जुड़ा हुआ है। यहां की अक्खड़ता बनारसी रंग लोगों पर आम रहती है।
8- बाहरी अलंग- काशी की मौज मस्ती में बाहरी अलंग का अपना अलग महत्व और आकर्षण है। जिसका आनंद लगभग हर बनारसी उठाता हैं। बाहरी अलंग के तहत सभी तरह के मानसिक और शारीरिक तनाव को दूर करने के लिए बाहर घूमने जाते हैं। पहले बनारसी बाहरी अलंग करने गंगा उस पार रेती पर जाकर नित्य क्रिया के बाद गंगा में स्नान, ध्यान के करने के बाद ठंडई के साथ वहीं पर बाटी लगाकर खाते थे। जिससे लोग तरोताजा हो जाते थे। वर्तमान समय में बाहरी अलग का स्वरूप थोड़ा बदल गया है। अब काशी वासी उस पर रेती पर जाने के अलावा रामनगर, राजदरी, देवदरी, समेत शहर से दूर शांत व प्राकृतिक स्थलों पर पिकनिक मनाने जाते हैं। इस दौरान वहीं पर कुछ लोग बाटी चोखा बनाते हैं तो ज्यादातर लोग कोल्ड ड्रिंक के साथ चिप्स खाते हुए चाय पीते हैं।
9- गहरेबाजी- बनारस में मौजमस्ती का प्रतीक गहरेबाजी भी रहा है। बनारसी पूरे उत्साह के साथ भांग छान, माथे पर टीका कन्धे पर गमछा कान में इत्र लगाकर गहरेबाजी में भाग लेता है।
10- सांड़बाजी- बनारस की सड़कों पर मदमस्त सांड़ों को कहीं भी विचरते देखा जा सकता है। स्वभाव से विपरीत यहां सांड़ लोगों पर धावा नहीं बोलते लेकिन जब दो सांड़ों का आमना-सामना जंग में बदल जाता है तो लबे सड़क लोग रूककर सांड़ों की जोरआजमाइश का मजा लेते हैं और अपने खास अंदाज में 'जियो बेटा' की आवाज लगाते हुए सांड़ों को और भड़काते हैं। इस दौरान उन्हें ऑफिस के लिए भले ही देर हो जाये उसकी परवाह कोई नहीं करता।
11- मंदिर में दर्शन व कचौड़ी जलेबी का मजा- बनारसी सुबह जल्दी उठकर मंदिरों में दर्शन करने के बाद दुआ सलाम करते हुए परिचित दुकान पर जलेबी कचौड़ी का मजा लेता है।
12- अड़ीबाजी- चायपान की दुकानों पर आम बनारसी जमकर अड़ीबाजी करता है। चाय की चुस्की के साथ शुरू हो जाती है धर्म, अर्थ, खेल, राजनीति जैसे अन्य विषयों की चर्चा। इस दौरान कोई देश का प्रधानमंत्री कैसा है पर बहस करता है तो कोई किसी की सरकार बातों से ही बना देता है। इस दौरान कब घंटे दो घंटे यूं ही बीत जाते हैं लोगों को पता ही नहीं चलता है।
13- घाटों पर घूमना- शाम ढलने के साथ ही बनारसी मौजमस्ती को खोजने घाटों की तरफ बढ़ने लगते हैं। घाटों की सीढ़ियों पर बैठकर गंगाजी के प्रवाहमान जल को निहारता हुए प्रसन्न होता है।
14- मॉल कल्चर- काशी में पारंपरिक मौजमस्ती की कड़ी में अब आधुनिक मॉल कल्चर भी शामिल हो गया है। मॉल में जाकर घूमना कोल्ड ड्रिंक के साथ पॉपकार्न खाना फिल्में देखना लोगों के मौजमस्ती का जरिया बन गया है। खासकर युवा वर्ग मॉल में जाना अधिक पसंद करता है।
सिनेमा का फलता-फूलता बाजार : काशी
लाइट, कैमरा, एक्शन! जी हाँ काशी में फिल्म निर्माण अब आम बात हो गई है। लागा चुनरी में दाग, गैंग्स ऑफ वासेपुर, मोहल्ला अस्सी, यमला पगला दीवाना, राँझणा जैसी आधुनिक फिल्में काशी की पृष्ठभूमि पर बनीं। फिल्मों का मात्र एक कोना है। सिनेमा का आधुनिक दौर काशी को फलते-फूलते बाजार की कसौटी पर कस रहा है। आइए काशी के सिने मार्केट से अवगत होते हैं।
काशी में सिनेमा जगत का प्रारम्भिक दौर-
वास्तव में फिल्मिस्तान के मूलतः दो ही केन्द्र हैं, बाम्बे और मद्रास। (1975) में वाराणसी के कुछ निर्माताओं ने प्रयोग के तौर पर दंगल नामक भोजपुरी फिल्म का निर्माण किया, जिसमें उन्हें अशातीत सफलता मिली।
काशी में फिल्मों के उन्नायक- आगा हश्र काश्मीरी- आगा हश्र काश्मीरी के पिता मूलतः काश्मीरी थे, तथा काशी में शाल का व्यापार करने आये और यहीं के बाशिन्दे हो गये, वाराणसी में थियेटर युग की समाप्ति के बाद मदन थियेटर के फिल्म 'समाज का शिकार' उर्फ 'भारतीय लक' का दिग्दर्शन किया। आगा जी गीत, संवाद, कहानी लेखन में अति महत्वपूर्ण रहे। 'पाक-दामन' 'बिल्व मंगल', आँख का नशा' 'हिन्दुस्तान', यहूदी की लड़की', 'शीरी-फरहाद' 'भीष्म प्रतिज्ञा' उनके द्वारा लिखी महत्वपूर्ण फिल्में हैं।
कुन्दन कुमार- कुन्दन कुमार ने 'गंगा मइया तोहे पियरी चढ़ैबे, 'लागी नाही छूटे राम', 'भौजी' (भोजपुरी) 'अपना पराया', 'फौलाद' 'परदेशी', दुनिया के मेले आदि फिल्मों का निर्माण व निर्देशन कर काशी का मान संवर्द्धन किया।
अरविन्द सेन- अरविन्द सेन ने 'चौबे जी', अमानत', 'काफिला', 'मुकद्दर', 'जमाना', 'जालसाज', 'मेरे अरमाँ', 'मेरे सपने', 'मर्यादा', 'अतिथि', 'कसौटी', 'नसीहत', आदि फिल्मों का निर्माण निर्देशन कर काशी को गौरवान्वित किया।
देवी शर्मा- वाराणसी के ही देवी शर्मा ने 'गुनाहों का देवता' काली टोपी लाल रूमाल, गंगा की लहरें, सुहागरात, नाचे नागिन बाजे बीन का सफल निर्देशन किया।
कनक मिश्र- काशी के फिल्म निर्देशक कनक मिश्र ने जियो तो जियो, 'सावन को आने दो' जैसी सुपरहिट फिल्मों का निर्माण किया।
प्रेमचन्द- प्रख्यात साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द आगा हश्र के बाद काशी सिने साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आप अजंता मिनोटोन के आह्वान पर मुम्बई गये 'गरीब-मजदूर', 'सेवा-सदन' 'बाजारे हुस्न', 'तिरिया चरित', 'स्वामी', 'रंगभूमि' लिखी। दूसरे नामों से भी फिल्में लिखीं तथा मरणोपरान्त 'गोदान', 'शतरंज के खिलाड़ी', 'निष्कृति' पर फिल्में बनीं।
अन्य फिल्म निर्देशक- वाराणसी के सिने परम्परा में गोपाल मोती व ज्ञानकुमार ने मीनू, एस0एन0 श्रीवास्तव ने 'विद्यार्थी' ओमप्रकाश जौहरी ने 'एक सूरत दो दिल', त्रिलोक जेटली द्वारा 'गोदान' 0के0 गुप्ता की चिमनी का धुआँ, सुन्दर दर की सोरहो सिंगार कर दुल्हनियाँ आई इसके अतिरिक्त द्वारिकादास, ज्ञान चन्द्र श्रीवास्तव, प्रभाकर सिंह जैसे निर्देशकों ने काशी फिल्म को पुष्पित-पल्लवित किया।
काशी की अभिनय परम्परा- भले ही काशी का कोई कलाकार सुपरस्टार नहीं हुआ लेकिन कन्हैया लाल, लीला मिश्रा, कुमकुम, मोनिका, अम्बिका वर्मा, सुजीत कुमार पद्मा खन्ना, साधना सिंह, नारायण भण्डारी, मधु मिश्रा, जे0 मोहन, देव मल्होत्रा, केवल कृष्ण, रत्नेश्वरी, रामचन्द्र विश्वकर्मा, पूनम मिश्र, सोनी राठौर, त्रिभुवन बच्चन, अशोक सेठ, संजय ने अमिट छाप अभिनय में छोड़ी।
फिल्मी संगीत निर्देशन वादन- पं0 रविशंकर व पं0 एस0एन0 त्रिपाठी ने चिरस्मरणीय फिल्मी धुनें बनाईं तथा फिल्मी संगीत में शास्त्रीय धुनों का सम्मिश्रण किया। फिल्म 'गूँज उठी शहनाई' में बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई, पं0 किशन महराज, पं0 शामता प्रसाद उर्फ गुदई महराज द्वारा फिल्मों में झंकृत कर देने वाला तबला वादन अविस्मरणीय है। संगीतकार हेमन्त भी काशी की धरती का धूल माथे पर लगाये बिना नहीं रह सके।
नृत्य एवम् नृत्य निर्देशन- वाराणसी की तारा, सितारा व अलकनन्दा बहनों ने नृत्य विधा में धूम मचाकर नृत्य कौशल को नई कसौटी में कसा। बेहतरीन नृत्य निर्देशिका अन्नपूर्णा 'रजिया सुल्तान' फिल्म में अनुबन्धित होने के कुछ समय बाद ही दिवंगत हो गई। माधव किशन जाने-माने नृत्य-निर्देशक रहे। नर्तक रामकृष्ण, सोनी राठौर तथा पूनम मिश्र ने भी नृत्य निर्देशन में एक अलग पहचान बनाई है।
गायक-गायिका- बनारस घराने की गायिका राजकुमारी ने फिल्म 'महल' तथा गायिका गिरजा देवी ने फिल्म 'याद रहे' में गाना गाया। मदन विश्वकर्मा ने कई भोजपुरी फिल्मों में गीत गाये।
गीतकार- अनजान बनारस के सर्वाधिक प्रतिष्ठित और सफल गीतकार रहे, जिन्होंने 'खई के पान बनारस वाला' जैसे गीत रचना से एक अलग मुकाम हासिल किया। इनके पुत्र समीर की बॉलीवुड गीतकारों में तूती बोल रही है।
बी-बी मौजी, भोलानाथ गहमरी, मधुकर बिहारी, डॉ0 नामवर सिंह ने भी गीत रचना में सराहनीय प्रयास किये।
फिल्म समीक्षा प्रचार-प्रसार- काशी में दिनेश भारती, कुमार विजय, भोलानाथ मिश्र, बंशीधर राजू, शेखर धोवाल नामक व्यक्तियों ने समुचित फिल्म समीक्षा एवम् गीतकार अनजान के भाई गोपाल पाण्डेय सफल फिल्म जनसम्पर्क अधिकारी रहे हैं। फिल्म प्रचार एवम् छायांकन में धीरेन्द्र, किशन व बृजकुमार ने अच्छा नाम कमाया।
भोजपुरी फिल्मों का दौर काशी में- भोजपुरी फिल्मों का दौर 1975 से 'दंगल' से शुरू हुआ। काशी में निर्मित भोजपुरी फिल्मों की श्रं'खला इस प्रकार है।
'दंगल', 'माई क।़ लाल', 'धरती मइया', 'गंगा मइया भर द अचरवा हमार', 'सोनवा क।़ पिंजरा', 'गंगा किनारे मोरा गांव', 'नैहर की चुनरी', 'वेदना', 'भारत की सन्तान', 'सिन्धुरवा भइल मोहाल', 'बसुरिया बाजे गंगा तीर', 'पान खाये सैयाँ हमार', 'आँगन की लक्ष्मी', 'दुलहिन', 'किस्ती किनारा', 'बैरी कॅगना', 'ससुरा बड़ा पइसा वाला', आदि।
टी0वी0 सीरियल- गंगाघाट, गंगा के तीरे-तीरे, रंग ली चुनरिया रंग में, सजाय द।़ मॉग हमार, माई क।़ ऍचरा, भारत की संतान, गंगा जइसन भौजी हमार, घर गृहस्थी, चम्पा-चमेली, गंगा मइया भर द।़ गोदिया हमार, सबै नचावत राम गोसाई, गंगा माई, गंगा दर्शन, सुबहे काशी आदि बनारस के प्रमुख सीरियल हैं।
फिल्म वितरक कम्पनी- 0जी0 फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर्स, देवी पद्ममावती फिल्म्स, श्री विन्ध्याचित्रम्, सरोज फिल्म्स, लाईट ट्रेडर्स, रवि फिल्म्स, 0के0 डिस्ट्रीब्यूशन, फिल्म एण्ड फिल्मको, काशी फिल्म्स, सरोज फिल्म्स, राजकमल डिस्ट्रीब्यूटर, 0के0 डिस्ट्रीब्यूटर आदि प्रमुख वितरण कम्पनियाँ हैं। फिल्म वितरण का केन्द्र काशी के होने से अब दिल्ली, यू0पी0 टेरिटरों जो एक में है, दो भागों में बाँटने की बात चल रही है।
फिल्मी पत्रिका- श्रीमुन्नू प्रसाद पाण्डेय ने उत्तर-प्रदेश का पहला फिल्मी साप्ताहिक पत्र 'रम्भा' का प्रकाशन शुरू किया। यह पत्र अब भी काशी का एक मात्र फिल्मी पत्र है।
सत्यजीत राय और काशी का फिल्मांकन- सत्यजीत राय का प्रथम बनारस आगमन 'पथेर पांचाली' सिरीज की फिल्म 'ओपुर संसार' की शूटिंग के दौरान हुआ थ। इस फिल्म में बनारस की सही जानकारी न होने के कारण 'जय बाबा फेलूनाथ' की शूटिंग के दौरान 16 दिन वाराणसी में रहे।

ओपुर संसार में बनारसी गालियों-घाटों के साथ-साथ 'जय बाबा फेलूनाथ' में बनारस की अलग-अलग विशेषताओं का प्रभाव है। वे बनारसी स्थानीय भित्ति चित्र से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने अपनी किताब 'एकेई बोले' शूटिंग के फेलूदार शंगे काशी ते' में उल्लेख हुआ है। बनारसी साड़ों को भी उन्होंने अपनी फिल्म में जगह दी। सत्यजीत राय के अनुसार बनारसी फिल्मों का एक अलग मिजाज है।
- अभिनव पाण्डेय



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वाराणसी घाट पर नाव की सवारी

आगंतुक शाम को सूर्यास्त देखने और गंगा आरती देख , नदी के तट पर एक नाव की सवारी के लिए प्यार वाराणसी के लिए आते हैं हर आगंतुक से सपनों में से एक है . घाट की चमचमाती पानी पर आगंतुकों इसके कई घाटों पर एक सुंदर नाव यात्रा का आनंद ले सकते हो. आगंतुकों को गंगा में एक नाव की सवारी के लिए है कभी नहीं भूल पूरे देश में आते हैं. आप सूर्यास्त और सबसे देखने योग्य पल नाव से गंगा आरती देख रहा है दोनों के एक दृश्य का मौका मिलता है , जहां आप सूर्योदय देखने या शाम को देख सकता था कि इतनी नाव की सवारी सुबह में बेहतर कर रहे हैं सबसे अच्छा पल में से एक और याद है पल .
आगंतुकों को एक पूरी नाव बुक करा सकते हैं या एक साझा नाव में सवारी हो सकता था , यह भी कुछ लक्जरी नाव रहे हैं. नाव की सवारी वाराणसी के सर्वश्रेष्ठ होटलों में से कुछ लोगों द्वारा की पेशकश की गई है , ताज गंगा होटल उनमें से एक है और वे की जरूरत है जो उनके ग्राहक नाव की सवारी की पेशकश . वाराणसी में यूथ नावों से ठंडे पानी छूने और एक दूसरे का सामना करना पड़ा करने पर पानी के छिड़काव से एक दूसरे के साथ खेलने के लिए इतना छोटा है कि नावों में ग्रस्त है प्यार करता हूँ.






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सारनाथ, वाराणसी

सारनाथ, वाराणसी के पवित्र शहर से लगभग 10 किमी है, जगह है जहां बुद्ध अपनी पहली धर्मोपदेश देने का फैसला किया है. मनाया मंत्र 'Buddham के Sharanam Gachhami, सारनाथ के लिए अपने मूल बकाया है. पर दिन पहले उनकी मृत्यु बुद्ध सारनाथ लुम्बिनी, बोधगया और कुशीनगर के साथ चार स्थानों पर वह अपने अनुयायियों के लिए पवित्र माना जाता है के रूप में शामिल है. यह एक सबसे सम्मानित बौद्ध स्थानों सारनाथ बनाता है. बौद्ध धर्म के अलावा, सारनाथ भी जैन धर्म के साथ जुड़ा हुआ है.

कई बौद्ध स्मारकों और सारनाथ में इमारतें हैं. सारनाथ में महत्वपूर्ण बौद्ध स्मारकों में से कुछ Dhamekha स्तूप, चौखंडी स्तूप और जापान, चीन, थाईलैंड, बर्मा और दूसरों से बौद्ध धर्म के विभिन्न स्कूलों के मठों और मंदिरों हैं. भारतीय बौद्ध समाज बुलाया महाबोधि सोसायटी बुद्ध मंदिर के चारों ओर एक पार्क रखता है. पार्क के भीतर महाबोधि मंदिर बुद्ध के दाँत अवशेष है.

वहाँ भी सारनाथ में प्राचीन खंडहर के विशाल अन्तर है. कई बौद्ध संरचनाओं 3 शताब्दी ईसा पूर्व और 11 वीं शताब्दी ई. के बीच सारनाथ में उठाए गए थे, और आज यह बौद्ध निशान पर स्थानों के बीच सबसे विशाल खंडहर प्रस्तुत करता है. सारनाथ के अशोक स्तंभ भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है.


 सारनाथ, वाराणसी
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शिव मानस पूजा

रचना: आदि शङ्कराचार्य

रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं
नानारत्न विभूषितं मृगमदा मोदाङ्कितं चन्दनम् ।
जाती चम्पक बिल्वपत्र रचितं पुष्पं च धूपं तथा
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम् ॥ 1 ॥

सौवर्णे नवरत्नखण्ड रचिते पात्रे घृतं पायसं
भक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम् ।
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूर खण्डोज्ज्चलं
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु ॥ 2 ॥

छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलं
वीणा भेरि मृदङ्ग काहलकला गीतं च नृत्यं तथा ।
साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुति-र्बहुविधा-ह्येतत्-समस्तं मया
सङ्कल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो ॥ 3 ॥

आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं
पूजा ते विषयोपभोग-रचना निद्रा समाधिस्थितिः ।
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ॥ 4 ॥

कर चरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
श्रवण नयनजं वा मानसं वापराधम् ।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्-क्षमस्व
जय जय करुणाब्धे श्री महादेव शम्भो ॥ 5 ॥

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वाराणसी में योग

इस शहर ताकि विभिन्न योग गुरू योग आश्रम खोलने के लिए सबसे अच्छी जगह के रूप में वाराणसी पसंद करते है दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक है और आध्यात्मिकता के लिए जाना जाता है के रूप में वाराणसी योग का एक बड़ा केंद्र रहा है . योग शरीर के साथ ही मन और आत्मा के बीच संतुलन साधने का एक रूप है . योग शारीरिक व्यायाम के रूप में जाना अलग अभ्यास दूसरा एक सांस लेने की तकनीक के रूप में बुलाया व्यायाम साँस ले रहा है और पिछले एक मुद्रा है . वाराणसी में आप चेलों सिखाता है और योग की कला के बारे में सीखता हैं जहां कई योग आश्रम मिलेगा .
योग एक संस्कृत शब्द है और यह कई अर्थ है , लेकिन इसके बारे में सबसे आम का मतलब संघ है . वे शरीर , मन और आत्मा हैं सभी तीन महत्वपूर्ण बातों को एकजुट करने का मतलब है. योग अभ्यास जो लोग खुश है, और शांत कर रहे हैं . योग ऐसी हाथ योग , Kriplau योग , तंत्र योग आदि के रूप में कई रूपोंवाराणसी में दो लोकप्रिय विश्वविद्यालयों बीएचयू और Sampurnanand संस्कृत विश्वविद्यालय भी योग , आयुर्वेद और ध्यान और ज्योतिष के लिए अलग संकायों और विभागों है . वाराणसी में योग का मुख्य केंद्र रहे हैं जो एक सूची के नीचे .

    
बीएचयू
    
मैन मंदिर
    
Sampurnanand संस्कृत विश्वविद्यालय
    
संकट मोचन
    
प्रज्ञा योग संस्थान
    
बनारस योग मंदिर






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वाराणसी में जैन धर्म

जैन धर्म आज की पहचान सबसे पुराने धर्मों में से एक है . यह सिर्फ एक धर्म नहीं है, यह एक सुखी जीवन जीने का तरीका सोचा है . उसके प्रधानाचार्यों , जीवन और दर्शन का रास्ता स्वर्गीय अहसास और स्वतंत्रता के प्रति भावना प्रगति के लिए स्वयं प्रयास के आवश्यक जोर. वाराणसी जैन समुदाय के लिए अधिक का दौरा किया स्थान है . जैन वाराणसी जगह है कि विश्वास है जहां 23 Tirthhankar Parshvanathat . दिगंबर मंदिर के रूप में जाना वाराणसी में एक जैन मंदिर इस मंदिर Bhelupur , वाराणसी के पास स्थित है. इस मंदिर वाराणसी के जैन समुदाय के लिए एक बड़ा महत्व है .
Bachraj घाट भी यह गंगा के तट पर स्थित है , जैन घाट के रूप में जाना जाता है, यह जैन महाराज इस घाट के स्वामित्व में है कि कहा जाता है. इस घाट के पास इन मंदिरों पर जाकर जैन तीर्थ के लिए एक जीवन भर का अनुभव है कि माना जाता है कि गंगा के तट के पास स्थित तीन जैन मंदिर हैं . जैन समुदाय के लोग इस जगह को गंगा में एक डुबकी है और उसके बाद प्रार्थना सभी तीन पवित्रा मंदिरों में एक के बाद एक के लिए जाने के लिए एक यात्रा है .



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पार्क और वाराणसी में गार्डन

वाराणसी वाराणसी के लोगों के आराम के लिए कुछ पल बिताना जहां कुछ प्रसिद्ध पार्क और उद्यान है. बड़े लोगों के लिए कुछ व्यायाम और युवा लोगों को कुछ गप - समर्थन है यहाँ आने के लिए होने के लिए यहां आते हैं. अधिकांश पार्कों नाम वाराणसी से संबंधित दिया गया है और उनके जीवन में कुछ उल्लेखनीय काम किया है , जो कुछ प्रसिद्ध लोगों के नाम पर दे दिया गया है . छवियों के साथ वाराणसी के कुछ प्रसिद्ध ज्ञात पार्कों वहाँ नीचे .
Machodari पार्क : पार्क वाराणसी में रवीन्द्रनाथ टैगोर रोड , कोतवाली के पास स्थित है . आप गंगा नदी के किनारे आ गए हैं तो यह प्रसिद्ध आदमी घाट से 1 मी अधिकतम है .
Dumraubagh पार्क : यह भी वाराणसी के प्रसिद्ध घाट से एक है घाट इस पार्क अस्सी के पास स्थित है. इस पार्क वाराणसी के अन्य पार्क के रूप में यह कुछ सत्ता पक्ष और एक जंगल जिम है आकार में के रूप में बड़ा नहीं है .
नेहरू पार्क : वाराणसी में अन्य पार्क से तुलना करें , यह मॉल रोड , छावनी वाराणसी पर सही अगले JHV मल्टीप्लेक्स में स्थित गया के रूप में यह पार्क बहुत साफ है . परिवार वहाँ कुछ स्लाइड्स के झूलों और पर खेलने के लिए अन्य बातों के रूप में मजा करने के लिए आता है .
शाहिद उद्यान : इस पार्क युद्धों में उनके जीवन खो दिया है , जो उन लोगों के समर्पण में बनाया गया था . ऐसा क्यों है कि शाहिद उद्यान के रूप में नामित किया है. पार्क में सुबह और शाम में खुलती है . और समय के बाकी यह बंद कर दिया गया .
रोज गार्डन : रोज गार्डन सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय वाराणसी में है . गार्डन गुलाब के विभिन्न प्रकार यहां पाया गया है के लिए प्रसिद्ध है . वे यहां आराम कर भरा रूप में बीएचयू के छात्र यहां कुछ पल बिताना . इस पार्क क्योंकि कम आगंतुकों के नौजवान और जोड़ों के बीच प्रसिद्ध है .
Shivala पार्क : इस पार्क आप सत्ता पक्ष के एक बिंदु पर शुरू करने और दूर दूर कुछ समाप्त कर रहे हैं देख सकते हैं , सबसे पुराने एक में से एक है . यह पार्क अब क्योंकि कोई रखरखाव के जंगल के रूप में तब्दील हो रही है .
रविदास पार्क : पार्क महान संत रविदास को समर्पित है और Nagwa वाराणसी में स्थित है. यह भी कुछ स्लाइड और झूलों के रूप में इस पार्क में भी माता - पिता अपने बच्चों के साथ आते हैं. आप वे 5 रुपए चार्ज वयस्क और बच्चों के लिए 2 रुपए के लिए पार्क में प्रवेश करने के लिए भुगतान किया है के रूप में यह पार्क कुछ विशिष्टता है .


बनारस के पार्क..

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सब रोगों की एक दवा.. हसना सीखो मेरे भाई

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डरने की बात नहीं.

अपने मंगरू भाई भांग वाले का ही चेला है .......... :)




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नगर

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वाराणसी बनारस या काशी
वाराणसी  बनारस या काशी भी कहलाता है। वाराणसी दक्षिण-पूर्वी उत्तर प्रदेश राज्य, उत्तरी-मध्य भारत में गंगा नदी के बाएँ तट पर स्थित है और हिन्दुओं के सात पवित्र नगरों में से एक है। इसे मन्दिरों एवं घाटों का नगर भी कहा जाता है। वाराणसी का पुराना नाम काशी है। वाराणसी विश्व का प्राचीनतम बसा हुआ शहर है। यह गंगा नदी के किनारे बसा है और हज़ारों साल से उत्तर भारत का धार्मिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र रहा है। दो नदियों वरुणा और असि के मध्य बसा होने के कारण इसका नाम वाराणसी पड़ा। बनारस या वाराणसी का नाम पुराणों, रामायण, महाभारत जैसे अनेकानेक ग्रन्थों में मिलता है। वेदों में भी काशी का उल्लेख है। संस्कृत पढ़ने प्राचीन काल से ही लोग वाराणसी आया करते थे। वाराणसी के घरानों की हिन्दुस्तानी संगीत में अपनी ही शैली है। काशी और बनारस के नाम से विख्यात वाराणसी विश्व के प्राचीनतम जीवंत शहरों में एक है। वास्तव में हिंदू मिथकों में वाराणसी का महत्व अकथ्य है। अंग्रेजी के प्रख्यात साहित्यकार मार्क ट्वेन बनारस की पवित्रता और मिथकीय विश्वास से अभिभूत थे। एक बार उन्होंने लिखा-"बनारस इतिहास से प्राचीन है, परंपरा से प्राचीन है, मिथकों से भी प्राचीन है और इतना प्राचीन दिखता है, जैसे इन सभी को एक साथ रख दिया गया हो।" 'वामन पुराण' के अनुसार वरूणा और असि नदियां काल के प्रारंभ में स्वत: ही आद्य पुरूष के शरीर से निकली हैं। इन दोनो नदियों के मध्य की भूमि ही 'वाराणसी' कहलाती है, जो सभी तीर्थयात्रियों के लिए पवित्रतम स्थान है।
'काशी' शब्द की व्‍युत्पत्ति 'कास' शब्द से हुई है, जिसका अर्थ होता है चमकना। मिथक यह है कि काशी, शिव और पार्वती द्वारा सृजित मूल-भूमि है, जहाँ वे काल के प्रारंभ में खड़े थे।

वाराणसी हिंदू धर्म का नाभिस्थल है। यह प्राचीन संस्कृति का परंपरागत शहर है। यहाँ से जुड़ी किंवदंतिया इसकी गरिमा में वृद्धि करती हैं और धर्म इसमें पवित्रता बोध पैदा करता है। जाने कब से यहाँ बड़ी संख्या में तीर्थयात्री और साधक आते रहे हैं। वाराणसी में रहने से अपने आप ही आत्म अन्वेषण तथा शरीर एवं आत्मा के शास्वत ऐक्य का अनुभव होता है। यहाँ आने वाला हर यात्री विस्मित रह जाता है ।

सूर्यास्त के समय गंगा के पार सुनहली रश्मियाँ झिलमिलाती हैं। यही रश्मियाँ सुबह भगवान शिव के अलकों को छूती है, गंगा किनारे के मंदिरों-इबादतगाहों को स्पर्श करती है। मंत्रों और ऋचाओं की स्वर लहरियों तथा अगरबत्तियों-धूपबत्तियों की सुगंध से भीने वातावरण में गंगा के किनारे सुनहले जल में डुबकी लगाकर तीर्थ यात्री अनूठे अनुभव का एहसास करता है।

हिंदू विश्वास के अनुसार वाराणसी में मृत्यु को वरण करने वाला व्यक्ति मोक्ष की प्राप्ति करता है तथा जीवन-मृत्यु, जन्म-पुनर्जन्म के बंधन से मुक्ति पा जाता है। भगवान शिव और पार्वती के निवास स्थल वाराणसी का उद्भव अज्ञात है। ऐसा माना जाता है कि वाराणसी में गंगा जीवों के सभी पापों का नाश कर देती हैं। वाराणसी ऐसी भूमि है जहाँ रहना और आत्मान्वेषण करना अनंत सुख का अनुभव है। वाराणसी संगीत, कला, शिल्प और शिक्षा के लिए भी ख्यात है। भारत से बाहर गए आज विश्व के तमाम ख्यातनाम लोगों की शिक्षा वाराणसी के सांस्कृतिक परिवेश में हुई है।

स्थिति
वाराणसी भारतवर्ष की सांस्कृतिक एवं धार्मिक नगरी के रूप में विख्यात है। इसकी प्राचीनता की तुलना विश्व के अन्य प्राचीनतम नगरों जेरुसलेम, एथेंस तथा पेइकिंग (बीजिंग) से की जाती है। वाराणसी गंगा के बाएँ तट पर अर्द्धचंद्राकार में 250 18' उत्तरी अक्षांश एवं 830 1' पूर्वी देशांतर पर स्थित है। प्राचीन वाराणसी की मूल स्थिति विद्वानों के मध्य विवाद का विषय रही है।

विद्वानों के मतानुसार
शेरिंग मरडाक, ग्रीब्ज,और पारकर,जैसे विद्वानों के मतानुसार प्राचीन वाराणसी वर्तमान नगर के उत्तर में सारनाथ के समीप स्थित थी। किसी समय वाराणसी की स्थिति दक्षिण भाग में भी रही होगी। लेकिन वर्तमान नगर की स्थिति वाराणसी से पूर्णतया भिन्न है, जिससे यह प्राय: निश्चित है कि वाराणसी नगर की प्रकृति यथासमय एक स्थान से दूसरे स्थान पर विस्थापित होने की रही है। यह विस्थापन मुख्यतया दक्षिण की ओर हुआ है, पर किसी पुष्ट प्रमाण के अभाव में विद्वानों का उक्त मत समीचीन नहीं प्रतीत होता है। गंगा नदी के तट पर बसे इस शहर को ही भगवान शिव ने पृथ्वी पर अपना स्‍थायी निवास बनाया था। यह भी माना जाता है कि वाराणसी का निर्माण सृष्टि रचना के प्रारम्भिक चरण में ही हुआ था। यह शहर प्रथम ज्‍योर्तिलिंग का भी शहर है। पुराणों में वाराणसी को ब्रह्मांड का केंद्र बताया गया है तथा यह भी कहा गया है यहाँ के कण-कण में शिव निवास करते हैं। वाराणसी के लोगों के अनुसार, काशी के कण-कण में शिवशंकर हैं। इनके कहने का अर्थ यह है कि यहाँ के प्रत्‍येक पत्‍थर में शिव का निवास है। कहते हैं कि काशी शंकर भगवान के त्रिशूल पर टिकी है।

हेवेल की दृष्टि में
हेवेल की दृष्टि में वाराणसी नगर की स्थिति विस्थापन प्रधान थी, अपितु प्राचीन काल में भी वाराणसी का वर्तमान स्वरूप सुरक्षित था। हेवेल के मतानुसार बुद्ध पूर्व युग में आधुनिक सारनाथ एक घना जंगल था और यह विभिन्न धर्मावलंबियों का आश्रय स्थल भी था। भौगोलिक दशाओं के परिप्रेक्ष्य में हेवेल का मत युक्तिसंगत प्रतीत होता है। वास्तव में वाराणसी नगर का अस्तित्व बुद्ध से भी प्राचीन है तथा उनके आविर्भाव के सदियों पूर्व से ही यह एक धार्मिक नगरी के रूप में ख्याति प्राप्त था। सारनाथ का उद्भव महात्मा बुद्ध के प्रथम धर्मचक्र प्रवर्तन के उपरांत हुआ। रामलोचन सिंह ने भी कुछ संशोधनों के साथ हेवेल के मत का समर्थन किया है। उनके अनुसार नगर की मूल स्थिति प्राय: उत्तरी भाग में स्वीकार करनी चाहिए। हाल में अकथा के उत्खनन से इस बात की पुष्टि होती है कि वाराणसी की प्राचीन स्थिति उत्तर में थी जहाँ से 1300 ईसा पूर्व के अवशेष प्रकाश में आये हैं।

नामकरण

'वाराणसी' शब्द 'वरुणा' और 'असी' दो नदीवाचक शब्दों के योग से बना है। पौराणिक अनुश्रुतियों के अनुसार 'वरुणा' और 'असि' नाम की नदियों के बीच में बसने के कारण ही इस नगर का नाम वाराणसी पड़ा।

'पद्मपुराण' के एक उल्लेख के अनुसार दक्षिणोत्तर में 'वरना' और पूर्व में 'असि' की सीमा से घिरे होने के कारण इस नगर का नाम वाराणसी पड़ा।

    'अथर्ववेद' में वरणावती नदी का उल्लेख है। संभवत: यह आधुनिक वरुणा का ही समानार्थक है।
    'अग्निपुराण' में नासी नदी का उल्लेख मिलता है।
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महादेव.

।।श्री काशी विश्वनाथो विजयते।।


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चुनार किला

चुनार किला महाराजा Vikrmaditya, उज्जैन के राजा द्वारा अपने भाई राजा Bhrithari प्रवास के सम्मान में स्थापित किया गया था. पुराणों के अनुसार, preachings की हिंदू पुस्तक, Charanadri चुनार का सबसे पुराना नाम था के रूप में भगवान विष्णु Satyug की उम्र में महान राजा बाली के वंश में उसके अपने Vaman अवतार में पहला कदम उठाया था. यह भी अच्छी तरह से था Nainagarh के रूप में जाना जाता है.

Chandrakanta 'chunargarh, बाबू Devakinandan खत्री द्वारा प्रसिद्ध क्लासिक उपन्यास, वाराणसी के पवित्र शहर से केवल 40 किलोमीटर दूर है. चुनार किले गंगा नदी, गंगा के साथ पहाड़ों की विंध्य रेंज के एक विस्तार पर स्थित है, उसके आधार के निकट बह रही है. विभिन्न विदेशी झरने और धार्मिक पूजा स्थलों के पर्यटकों और स्थानीय लोगों के हजारों को आकर्षित करते हैं. चुनार अपने मिट्टी के बर्तनों के उद्योगों के लिए बहुत अच्छी तरह से जाना जाता है.


 चुनार किला
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नया विश्वनाथ मंदिर/ बिरला मंदिर , वाराणसी

नया विश्वनाथ मंदिर वाराणसी के बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के परिसर में स्थित है. यह भी भारत के प्रसिद्ध उद्योगपति परिवार, बिड़ला, यह निर्माण के रूप में बिरला मंदिर कहा जाता है. नई विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और मूल विश्वनाथ मंदिर की एक प्रतिकृति है. मंदिर सफेद पत्थर में बनाया गया है, और मदन मोहन मालवीय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक द्वारा की योजना बनाई है. नया विश्वनाथ मंदिर की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है कि यह सभी जातियों और धर्मों के लोगों के लिए खुला है. नई विश्वनाथ मंदिर के विशाल परिसर में आगंतुक की आँखों के लिए एक खुशी है. आंतरिक शिव लिंग और हिंदू ग्रंथों से छंद दीवारों पर अंकित है.


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राम नगर का किला.. वाराणसी

अवश्य जाएँ  :

रामनगर किला और संग्रहालय, गंगा नदी के दाएं किनारे पर स्थित है। यह किला, राजा बलवंत सिंह का शाही निवास था जिसे 17 वीं शताब्‍दी में बनवाया गया था।  रामनगर वह स्‍थल है जहां वेदव्‍यास के रचयिता ने तप किया था। वास्‍तव में, उनके तप करने के बाद इस जगह का वास्‍तविक नाम व्‍यास काशी था।
रामनगर प्रमुख रूप से 31 दिनों के लिए जाना जाता है, सितम्‍बर और अक्‍टूबर महीने में इन 31 दिनों में यहां रामलीला का आयोजन किया जाता है।  रामनगर संग्रहालय में खूबसूरती से नक्‍काशी की गई बालकनी, भव्‍य मंडप और खुले आंगन है।
इस संग्रहालय का सबसे अह्म हिस्‍सा विद्या मंदिर है जो शासकों के काल की अदालत का प्रतिनिधित्‍व करता है। इस संग्रहालय में कई प्राचीन वस्‍तुओं का नायाब कलेक्‍शन है जिनमें प्राचीन घडियां, पुराने शस्‍त्रगार, तलवारें, पुरानी बंदूकें, शाही कारें और हाथी दांत के काम के सामान शामिल है। पर्यटक यहां आकर शाही परिवारों के मध्‍ययुगीन वेशभूषा, आभूषण और फर्नीचर देख सकते है।












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बनारस शिव से कभी मुक्त नही, जब से आये कैलाश न गये। बनारसी की मस्ती को लिखा नही जा सकता अनुभव होता है। अद्भूद है ये शहर जिन्दगी जीनेका तरीका कुछ ठहरा हुआ है पर सुख ठहराव में है द्रुतविलंबित में नही. मध्यम में है इसको जीनेवाला है यह नगर। नटराज यहां विश्वेश्वर के रुप में विराजते है इसलिये श्मशान पर भी मस्ती का आलम है। जनजन् शंकरवत् है। इस का अनुभव ही आनन्द है ये जान कर जीना बनारस का जीना है जीवन रस को बना के जीना है।
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काल हर !! कष्ट हर !! दुख हर !! दरिद्र हर !! हर हर महादेव !! ॐ नमः शिवाय.. वाह बनारस वाह !!